मुझे बख्श दे बे-सबब या इलाही न करना कभी भी ग़ज़ब या इलाही
गुनाहों ने हाय कहीं का न छोड़ा मैं कब तक फिरूं ख़्वार अब या इलाही
पये शाह-ए-बतहा बुरी छूट जाएं बुरी आदतें सब की सब या इलाही
बड़ा हज पे आने को जी चाहता है बुलावा अब आएगा कब या इलाही
मैं मक्के में आऊं मदीने में आऊं बना कोई ऐसा सबब या इलाही
मैं देखूं मदीने का गुलशन दिखा दे तू दश्त ओ जबल अरब या इलाही
करम ऐसा कर दे मदीने में आकर गुज़ारूं मैं फिर रोज़ ओ शब या इलाही
दिखा दे बहार-ए-मदीना दिखा दे पये ताजदार-ए-अरब या इलाही
सलीक़ा शिआरी का मैं हूं भिकारी मिटे हुए शोर ओ शगब या इलाही
मिले बेक़रारी करूं आह ओ ज़ारी तेरे ख़ौफ़ से प्यारे रब या इलाही
करूँ आलमों की कभी भी न तौहीन, बना दे मुझे बा-अदब या इलाही
हुसैन इब्न-ए-हैदर के सदक़े में मौला, टलें आफ़तें मेरी सब या इलाही
ज़माने की फ़िक्रों से आज़ाद कर दे, मिटा ग़म अता कर तरब या इलाही
जो माँगा वो दे मुझ को वो भी अता कर, नहीं कर सका जो तलब या इलाही
मुसलमान मुसलमान के ख़ून का प्यासा, हुआ वक़्त आया अजब या इलाही
सभी एक हो जाएँ ईमान वाले, बने शाह-ए-आली नसब या इलाही
कभी तो मुझे ख़्वाब में मेरे मौला, हो दीदार-ए-माह-ए-अरब या इलाही
ख़ुदाया बुरे ख़ात्मे से बचा ले, गुनहगार है जाँ-ब-लब या इलाही
नज़र में मुहम्मद के जलवे बसे हों, चलूँ इस जहाँ से मैं जब या इलाही
पस-ए-मर्ग हो रोज़-ए-रोशन की मानिंद, मेरी क़ब्र की तीरा शब या इलाही
गुनाहों से अत्तार को दे माफ़ी
करम कर, न करना ग़ज़ब या इलाही