मुझे तुम मसलक-ए-अहमद रज़ा पर इस्तिकामत दो
बनों ख़िदमत गुज़ार-ए-अहल-ए-सुन्नत या रसूल अल्लाह
तुम्हारा ही तो ये लुत्फ़ ओ करम है रहमत-ए-आलम!
ज़ियाउद्दीन मदनी से है निस्बत या रसूल अल्लाह
मदीने की जुदाई में जो बेचारे तड़पते हैं
उन्हें दे दो मदीने की इजाज़त या रसूल अल्लाह
मुसलमां बाज़ आ जाएँ शहा! फ़ैशन परस्ती से
करम कर दो बनें पाबंद-ए-सुन्नत या रसूल अल्लाह
मरे वाबस्तगां की और मरे सारे क़बीले की
तुम्हें! इब्लीस से करना हिफ़ाज़त या रसूल अल्लाह
उमर का वास्ता अदा-ए-दीं बर्बाद हो जाएँ
मिले हर एक हासिद को हिदायत या रसूल अल्लाह
शहां इस इज्तिमा-ए-पाक में जितने मुसलमां हैं
हो सब की मग़फ़िरत हो सब पे रहमत या रसूल अल्लाह
तेरा अत्तार आना चाहता है तेरे रौज़े पर
अता हो हाज़िरी की फिर सआदत या रसूल अल्लाह