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Mustafa ka woh ladla pyara wah kya baat Aala Hazrat ki

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मुस्तफ़ा का वह लाडला प्यारा वाह क्या बात आला हज़रत की गौस-ए-आज़म की आँख का तारा वाह क्या बात आला हज़रत की सुन्नियों के दिलों में जिस ने थी शम्अ-ए-इश्क-ए-रसूल रोशन की वह हबीब-ए-खुदा का दीवाना वाह क्या बात आला हज़रत की अल्लाह अल्लाह तबहुर-ए-इल्मी अब भी बाकी है खिदमत-ए-क़लमी अहल-ए-सुन्नत का है जो सरमाया वाह क्या बात आला हज़रत की इल्म-ओ-इरफ़ान का जो सागर था खैर से हाफ़िज़ा क़वी तर था हक़ पे मब्नी था जिस का हर फ़तवा वाह क्या बात आला हज़रत की इस की हस्ती में था अमल-ए-जौहर सुन्नत-ए-मुस्तफ़ा का वह पैकर आलिम-ए-दीन, साहिब-ए-तक़वा वाह क्या बात आला हज़रत की जिस ने देखा उन्हें अक़ीदत से क़ल्ब की आँख से मोहब्बत से मरहबा मरहबा पुकार उठा वाह क्या बात आला हज़रत की सुन्नतों को चलादिया जिस ने दीन का डंका बजादिया जिस ने मदीना वह मुजद्दिद है दीन-ओ-मिल्लत का वाह क्या बात आला हज़रत की जो है अल्लाह का वली बे-शक आशिक़-ए-सादिक़ नबी बे-शक गौस-ए-आज़म का जो है मतवाला वाह क्या बात आला हज़रत की जिस ने अहक़ाक़-ए-हक़ किया खुल कर रद-ए-बातिल किया सदा खुल कर जो किसी से कभी ना घबराया वाह क्या बात आला हज़रत की सुन लो किल्क-ए-रज़ा है वह खंजर आज भी जिस से लर्ज़ां अहल-ए-शर बोल बाला है अहल-ए-सुन्नत का वाह क्या बात आला हज़रत की फिर बरेली शरीफ जाऊँ मैं बरकतें मुर्शिदी की पाऊँ मैं करलूँ रौज़े का खूब नज़ारा वाह क्या बात आला हज़रत की मौला बहर-ए-हदायि-ए-बख्शिश बख्श अत्तार को बिला पुरसिश खुल्द में कहता कहता जाये गा वाह क्या बात आला हज़रत की