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Na Arsh-e-Aiman Na Inni Zahib Mein Mehmam Hai

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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न अर्शे ऐमन न इन्नी ज़ाहिब में मेहमान है न लुत्फ़े उज़्न या अहमद नसीबे लन तरानी है नसीबे दोस्तॉं गिराँ उन के दर पे मौत आनी है ख़ुदायों ही करे फिर तो हमेशा ज़िन्दगानी है उसी दर पे तड़पते हैं पलकते हैं उठा जाता नहीं क्या ख़ूब अपनी ना-तवानी है हर इक दीवार ओ दर पर मेहर ने की है जबीं साई निगारे मस्जिदे अक़दस में कब सोने का पानी है तेरे मंगता की ख़ामोशी शफ़ाअत ख़्वाह है उसकी ज़बान-ए-बे-ज़बानी तर्जुमान-ए-ख़स्ता जानी है खुले क्या राज़-ए-महबूब-ओ-मुहिब मस्तान-ए-ग़फ़लत पर शराब-ए-क़द रअल् हक़ ज़ीब-ए-जाम-ए-मन रानी है जहाँ की ख़ाकरोबी ने चमन आरा किया तुझको सबा हम ने भी उन गलियों की कुछ दिन ख़ाक छानी है शहा क्या ज़ात तेरी हक़ नुमा है फ़र्द-ए-इमकाँ में के तुझ से कोई अव्वल है न तेरा कोई सानी है कहाँ उस को शक-ए-जान-ए-जिनाँ में ज़र की नक़्क़ाशी इरम के ताइर-ए-रंग-ए-परीदा की निशानी है ज़ियाब फ़ी सियाब लब पे कलमा दिल में गुस्ताख़ी सलाम-ए-इस्लाम-ए-मुलहिद को के तस्लीम-ए-ज़बानी है यह अक्सर साथ उन के शाना-ओ-मिस्वाक का रहना बताता है कि दिल रेशों पे ज़ाहिद मेहरबानी है इसी सरकार से दुनिया-ओ-दीं मिलते हैं साइल को यही दरबार-ए-आली कन्ज़-ए-आमाल-ओ-अमानी है दरूदें सूरत-ए-हाला मुहीट-ए-माह-ए-तैयबा हैं बरस्ता उम्मत-ए-आसी पे अब रहमत का पानी है तआला अल्लाह इस्तग़ना तेरे दर के गदाओं का कि उन को आरिज़-ओ-शौकत साहिब-ए-क़ुरानी है वह सरगर्म-ए-शफ़ाअत हैं अरक़ अफ़शाँ है पेशानी करम का अत्र-ए-संदल की ज़मीं रहमत की घानी है यह सर हुआ और वह ख़ाक-ए-दर वह ख़ाक-ए-दर हुआ और यह सर रज़ा वह अगर चाहें तो अब दिल में यह ठानी है