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ना छेड़ो ज़िक्र-ए-जन्नत अब मदीना याद आया है

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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ना छेड़ो ज़िक्र-ए-जन्नत अब मदीना याद आया है नबी का सब्ज़ गुम्बद दिल की आँखों में समाया है मिला करती हैं मुँह माँगी मुरादें तेरे रोज़े पर ग़ुलामों ने तेरे दर से जो माँगा है वो पाया है नज़र आता है ऊँचा आसमानों से तेरा गुम्बद बुलंद अर्श-ए-मुअज़्ज़म से तेरी तुर्बत का पाया है ना होता तू अगर तो ईं-ओ-आँ कुछ भी ना होता तेरे बाइस ये सारा बाग़-ए-आलम लहलहाया है ख़ुदा की सल्तनत के तुम हो दूल्हा या रसूल अल्लाह तुम्हारे वास्ते रब ने ये सब आलम सजाया है शब-ए-इस्रा मुबारक थी ये हूर-ओ-ग़िलमाँ में मुहम्मद को ख़ुदा-ए-पाक ने दूल्हा बनाया है तू है आइना-ए-वहदत कोई कब मिसल है तेरा तू है साया ख़ुदा का दो जहाँ पर तेरा साया है