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ना क्यूँ हो मुझ को मुक़द्दर पे अपने नाज़ अगर

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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ना क्यूँ हो मुझ को मुक़द्दर पे अपने नाज़ अगर सगान-ए-तैबा में मेरा भी नाम हो जाए नज़र से दूर हो एक पल अगर जमाल-ए-हुज़ूर मरीज़-ए-इश्क़ को जीना हराम हो जाए ये कह रहा है फ़-तर्ज़ा के ग़ैर मुमकिन है खिलाफ़-ए-मर्ज़ी-ए-महबूब काम हो जाए अदब से शर्म से मुँह ढांप ले करे सजदा जो सामने कभी माह-ए-तमाम हो जाए शिकार मुझ को ना कर नफ़्स हूँ गुलाम-ए-हुज़ूर ना टुकड़े टुकड़े कहीं तेरा दाम हो जाए जमील-ए-कादरी रिज़वी का खातमा-बिल-ख़ैर तुफ़ैल-ए-हज़रत-ए-ख़ैर-उल-अनाम हो जाए