सवाल: नअतिया शायरी करना कैसा है?
जवाब: सुन्नते सहाबा अलैहिमुर्रिज़वान है यानी बाज़ सहाबा मसलन हस्सान बिन साबित रज़ी अल्लाह तआला अन्हु और हज़रत सय्यदना ज़ैद रज़ी अल्लाह तआला अन्हु वग़ैरहमा से नअतिया अशआर लिखना साबित है। ताहम ये ज़ेहन में रहे कि नअते शरीफ़ लिखना निहायत मुश्किल फ़न है, इस के लिए माहिर फ़न आलिमे दीन होना चाहिए, वरना आलिम न होने की सूरत में रदीफ़, क़ाफ़िया और बहर (यानी शेर का वज़न) वग़ैरह को निभाने के लिए ख़िलाफ़े शान अल्फ़ाज़ तरतीब पा जाने का ख़दशा रहता है। अवाम उन्नास को शायरी का शौक़ चराना मुनासिब नहीं कि नस्र के मुक़ाबले में नज़्म में कुफ़्रियत के सदूर का ज़्यादा अंदेशा रहता है। अगर शरई अग़लात से कलाम महफ़ूज़ रह भी गया तो "फ़ज़ूलियात" से बचने का ज़ेहन बहुत कम लोगों का होता है। जी हाँ आज कल जिस तरह आम गुफ़्तगू में फ़ज़ूल अल्फ़ाज़ की भरमार पायी जाती है इसी तरह "बयान" और "नअतिया कलाम" में भी होता है। (कुफ़्रिया कलिमात के बारे में सवाल स २३२ मकतबतुल मदीना)