नग़मा-ए-रूह

Written by Allama Hasan Raza Khan

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ऐ करीम इब्न-ए-करीम ऐ रहनुमा ऐ मुकतदा अख्तर-ए-बुर्ज-ए-सखावत गौहर-ए-दुरज-ए-अता आस्ताने पर तेरे हाज़िर है ये तेरा गदा लाज रख ले दस्त ओ दामन की मेरे बहर-ए-खुदा रूए रहमत बर मताब ऐ काम-ए-जाँ अज़ रूए मन हुर्मत-ए-रूह-ए-पयम्बर यक नज़र कुन सूए मन शाह-ए-अकलीम-ए-विलायत सरवर-ए-गीवाँ जनाब है तुम्हारे आस्ताने की ज़मीन गर्दूँ क़िबाब हसरत-ए-दिल की कशाकश से हैं लाखों इज़्तिराब इल्तिजा मकबूल कीजे अपने सायल की शताब रूए रहमत बर मताब ऐ काम-ए-जाँ अज़ रूए मन हुर्मत-ए-रूह-ए-पयम्बर यक नज़र कुन सूए मन सालिक-ए-राह-ए-ख़ुदा को रहनुमा है तेरी ज़ात मसलक-ए-इरफ़ान-ए-हक़ में पेशवा है तेरी ज़ात बे-नवायान्-ए-जहाँ का आसरा है तेरी ज़ात तिश्ना कामों के लिए बहर-ए-अता है तेरी ज़ात रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन हर तरफ़ से फ़ौज-ए-ग़म की है चढ़ाई अल-ग़ियास करती है पामाल ये बे-दस्त-ओ-पाई अल-ग़ियास फिर गई है शक्ल-ए-क़िस्मत सब ख़ुदाई अल-ग़ियास ऐ मेरे फ़रियाद-रस तेरी दुहाई अल-ग़ियास रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन नफ़्स-ए-अमारा के फंदे में फँसा हूँ अल-इयाज़ दर तिरा बेकस पनाह कूचा तिरा आलम-ए-मलाज़ रहम फ़रमा या मलाज़ी लुत्फ़ फ़रमा या मआज़ हाज़िर दर है ग़ुलाम-ए-आस्ताँ बहर-ए-नवाज़ रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन शहर-ए-यारा ऐ ज़ी-वकार ऐ बाग़-ए-आलम की बहार बहर-ए-एहसाँ रशह-ए-नीसाँ जूद-ए-किर्दगार हूँ ख़िज़ाँ ग़म के हाथों पामाली से दो-चार अर्ज़ करता हूँ तेरे दर पर ब-चश्म-ए-अश्क-बार रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन बर सर-ए-परख़ाश है मुझ से अदू-ए-बे-तमीज़ रात दिन है दर-पए क़ल्ब-ए-हज़ीं नफ़्स-ए-रजीज़ मुब्तला है सौ बलाओं में मेरी जान-ए-अज़ीज़ हल्ल-ए-मुश्किल आप के आगे नहीं दुश्वार चीज़ रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन एक जहाँ सैराब फ़ैज़-ए-अब्र है अब की बरस तरनवा हैं बुलबुलें पड़ता है गोश-ए-गुल में रस है यहाँ कश्त-ए-तमन्ना ख़ुश्क ओ ज़िन्दान-ए-क़फ़स ऐ सहाब-ए-रहमत-ए-हक़ सूखे धानों पर बरस रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन फ़स्ल-ए-गुल आई अरूसान-ए-चमन हैं सब्ज़ा पोश शादमानी का नवा-संजान-ए-गुलशन में है जोश जो-बनों पर आ गया हुस्न-ए-बहार-ए-गुल फ़रोश हाए ये रंग और मैं यूँ दाम में गुम-कर्दा होश रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन मुंकशिफ़ किस पर नहीं शान-ए-मुअल्ला का उरूज आफ़ताब-ए-हक़ नुमा हो तुम को है ज़ेबा उरूज मैं हज़ीज़-ए-ग़म में हूँ इमदाद हो शाहा उरूज हर तरक़्क़ी पर तरक़्क़ी हो बढ़े दूना उरूज रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन ताइब हो पामाल-ए-लश्कर-ए-अफ़कार-ए-रूह ता-ब-के तरसाँ रहे बे-मूनिस ओ ग़मख़्वार-ए-रूह हो चली है काविश-ए-ग़म से निहायत ज़ार-ए-रूह तालिब-ए-इमदाद है हर वक़्त ऐ दिलदार-ए-रूह रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन दबदबा में है फ़लक शौकत तिरा ऐ माह-ए-काख़ देखते हैं टोपियाँ थामे गदा ओ शाह-ए-काख़ क़स्र-ए-जन्नत से फ़ुज़ूँ रखता है इज़्ज़-ओ-जाह-ए-काख़ अब दिखा दे दीदा-ए-मुश्ताक़ को लिल्लाह काख़ रूए रहमत बर-मताब ऐ महे जाँ अज़ रूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैग़म्बर यक नज़र कुन सूए मन बादलियां छाईं हवा बदली हुए शादाब बाग़ गुंचे चटके फूल महके बस गया दिल का दिमाग़ आह ऐ ज़ोर-ए-क़फ़स दिल है के महरूमी का दाग़ वाह ऐ लुत्फ़-ए-सबा गुल है तमन्ना का चिराग़ रूए रहमत बरमतब ऐ काम-ए-जां आज़रूरूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैम्बर यक नज़र कुन सूए मन आसां है क़ौस-ए-फ़िक्र में तीर-ए-मेरा दिल हदफ़ नफ़्स-ओ-शैतां हर घड़ी कफ़ पर लब-ओ-ख़ंजर बकफ़ मुंतज़िर हूं मैं के अब आई सदा-ए-ला तख़फ़ सरवर-ए-दीं का तसदुक़ बहर-ए-सुल्तान-ए-नजफ़ रूए रहमत बरमतब ऐ काम-ए-जां आज़रूरूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैम्बर यक नज़र कुन सूए मन बढ़ चला है आज कल अहबाब में जोश-ए-निफ़ाक़ ख़ुश मज़ाक़ान-ए-ज़माना हो चले हैं बद-मज़ाक़ सैकड़ों पर्दों में पोशीदा है हुस्न-ए-इत्तफ़ाक़ बरसर-ए-पैकार हैं आगे जो थे अहल-ए-वफ़ाक़ रूए रहमत बरमतब ऐ काम-ए-जां आज़रूरूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैम्बर यक नज़र कुन सूए मन डर दरिंदों का अंधेरी रात सहरा होलनाक राह ना मालूम रअशा पांव में लाखों मगाक देख कर अब्र-ए-सियाह को दिल हुआ जाता है चाक आइये इमदाद को वरना होता हूं हलाक रूए रहमत बरमतब ऐ काम-ए-जां आज़रूरूए मन हुरमत-ए-रूह-ए-पैम्बर यक नज़र कुन सूए मन