नअमतें बांटता जिस समत वह ज़ीशान गया
साथ ही मुनशी-ए-रहमत का क़लम-दान गया
ले ख़बर जल्द के ग़ैरों की तरफ़ ध्यान गया
मेरे मौला मेरे आका तेरे क़ुर्बान गया
आह वह आँख के नाकाम तमन्ना ही रही
हाए वह दिल जो तेरे दर से पुर अरमान गया
दिल है वह दिल जो तेरी याद से मअमूर रहा
सर है वह सर जो तेरे क़दमों पे क़ुर्बान गया
उन्हें जाना उन्हें माना न रखा ग़ैर से काम
लिल्लाहिल हम्द में दुनिया से मुसलमान गया
और तुम पर मेरे आका की इनायत न सही
नजदियो! कलमा पढ़ाने का भी एहसान गया
आज ले उन की पनाह आज मदद मांग उन से
फिर न मानेंगे क़यामत में अगर मान गया
उफ़ रे मुनकिर यह बढ़ा जोश-ए-तअस्सुब आख़िर
भीड़ में हाथ से कमबख़्त के ईमान गया
जान ओ दिल होश ओ ख़िरद सब तो मदीने पहुंचे
तुम नहीं चलते रज़ा तो सामान गया
अश्क जारी हो जाते
ज़िक्र-ए-रसूल के वक़्त सहाबा-ए-किराम रज़ी अल्लाह तआला अन्हुम पर ऱिक्क़त तारी हो जाती और अश्क जारी हो जाते चुनांचे सय्यदुना अब्दुल्लाह इब्न उमर रज़ी अल्लाह तआला अन्हुमा जब रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का तज़किरा फ़रमाते तो आंखों से आंसू रवां हो जाते थे।
(अत-तबाक़ात अल-कुबरा लि-इब्न सअद, तज़किरत अब्दुल्लाह बिन उमर, ज 4, स 127, दार अल-कुतुब अल-इल्मिया बैरूत) काश! हमें भी यह सआदत नसीब हो जाती!
रोने वाली आंखें रोना सब का काम नहीं
ज़िक्र-ए-मोहब्बत आम है लेकिन सोज़-ए-मोहब्बत आम नहीं