नजदिया सख़्त ही गंदी है तबीयत तेरी
कुफ़्र क्या शिर्क का फ़ज़ला है नजासत तेरी
ख़ाक मुँह में तेरे कहता है किसे ख़ाक का ढेर
मिट गया दीन मिली ख़ाक में इज़्ज़त तेरी
तेरे नज़दीक हुआ किज़ब-ए-इलाही मुमकिन
तुझ पे शैतान की फटकार ये हिम्मत तेरी
बल्कि गन्नाव किया तू ने इकरार-ए-वु़कू
उफ़ रे नापाक यहाँ तक है ख़बासत तेरी
इल्म-ए-शैतान का हुआ इल्म-ए-नबी से ज़ायद
पढ़ूँ लाहौल न क्यों देख के सूरत तेरी
बज़्म-ए-मीलाद हो काना ले के जनम से बदतर
अरे अंधे अरे मरदूद ये जुर्रत तेरी
इल्म-ए-ग़ैबी में मजानीन-ओ-बहाइम का शममूल
कुफ़्र-आमेज़ जुनूँ-ज़ा है जहालत तेरी
याद-ए-ख़र से हो नमाज़ों में ख़याल उन का बुरा
उफ़ जहन्नम के गधे उफ़ ये ख़ुराफ़ात तेरी
उन की ताज़ीम करे न अगर वक़्त-ए-नमाज़
मारी जाएगी तेरे मुँह पे इबादत तेरी
है कभी बूम की जिल्लत तो कभी ज़ाग-ए-हलाल
जीफ़ा ख़्वारी की कहीं जाती है आदत तेरी
बस की चाल तो क्या आती गई अपनी भी
इज्तिहादों ही से ज़ाहिर है हमाक़त तेरी
खुले लफ़्ज़ों में कहे क़ाज़ी शौकाँ मदद दे
या अली सुन के बिगड़ जाए तबीयत तेरी
तेरी अटके तो वकीलों से करे इस्तमदाद
और तबीबों से मदद ख़्वाह हो इल्लत तेरी
हश्र का दिन नहीं जिस रोज़ किसी का कोई
इस क़यामत में जो फ़रमाएँ शफ़ाअत तेरी
उन के दुश्मन से तुझे रब रहे मेल रहे
शर्म अल्लाह से कर क्या हुई ग़ैरत तेरी
तू ने क्या बाप को समझा है ज़्यादा उन से
जोश में आई जो उस दर्जा हरारत तेरी
उन के दुश्मन को अगर तू ने न समझा दुश्मन
वो क़यामत में करेंगे न रफ़ाक़त तेरी
उन के दुश्मन का जो दुश्मन नहीं सच कहता हूँ
दअवा बे-अस्ल है झूटी है मोहब्बत तेरी
बल्कि ईमान की पूछे तो है ईमान यही
उन से इश्क़ उन के अदु से हो अदावत तेरी
अहले-सुन्नत का अमल तेरी ग़ज़ल पर हो हसन
जब मैं जानूँ कि ठिकाने लगी मेहनत तेरी