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नक़ाब अपने रुख़ से उठा गौस-ए-आज़म

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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नक़ाब अपने रुख़ से उठा गौस-ए-आज़म मुझे अपना जलवा दिखा गौस-ए-आज़म मुझे ऐसा शैदा बना गौस-ए-आज़म कि हो जाऊँ तुझ पर फ़िदा गौस-ए-आज़म मरे पीर-ए-रोशन ज़मीर आप को तो मरे हाल का है पता गौस-ए-आज़म तुम्हारे हैं जितने मुरीद उन सभी में बुरा हूँ, बना दो भला गौस-ए-आज़म बरोज़-ए-क़यामत हमें अपने झंडे तले दीजिए गा जगह गौस-ए-आज़म जो बीमारियों में घेरे हैं उन्हें तुम दिला दो ख़ुदा से शिफ़ा गौस-ए-आज़म मुरीदीन को जो सताते हैं जिन्नात ख़ुदारा उन्हें दो भगा गौस-ए-आज़म नज़र से या जादू से जो हैं परेशान हो उन पर भी चश्म-ए-अता गौस-ए-आज़म कलेजा शयातीन का थर्रा उठे गा पुकारो सभी मिल के या गौस-ए-आज़म सजाएँ अमामा बढ़ाएँ जो दाढ़ी उन्हें हशर में बख्शवा गौस-ए-आज़म वो बहनें जो पहनें सदा मदनी बुरक़ा उन्हें हशर में बख्शवा गौस-ए-आज़म जो हैं वक़्फ़-ए-सुन्नत की ख़ातिर उन्हें हशर में बख्शवा गौस-ए-आज़म जो रोज़ाना देते हैं नेकी की दावत उन्हें हशर में बख्शवा गौस-ए-आज़म सफ़र क़ाफ़िले में जो करते हैं हर माह उन्हें हशर में बख्शवा गौस-ए-आज़म जो दें राह-ए-मौला में बारह महीने उन्हें हशर में बख्शवा गौस-ए-आज़म जो अपनाते हैं मदनी इनाम अक्सर उन्हें हशर में बख्शवा गौस-ए-आज़म दम-ए-नज़अ पानी उतरता नहीं है पिला शरबत-ए-दीद या गौस-ए-आज़म है अत्तार को सलब-ए-ईमाँ का डर का बचा इस का ईमाँ बचा गौस-ए-आज़म