मुबारक फ़ज़ल भाई को अजब ही नूर छाया है
शब-ए-असरा के दूल्हा ने उन्हें दूल्हा बनाया है
जगाया तुम ने सुन्नत को मिटाया तुम ने बिदअत को
लिहाज़ा सौ शहीदों का सवाब-ओ-अज्र पाया है
क्या नाराज़ सब को और राज़ी कर लिया रब को
ग़रज़ कि इस तिजारत में नफ़ा काफ़ी कमाया है
रसूल-ए-अल्लाह तुम से ख़ुश हैं और अल्लाह भी राज़ी
अमल से तुम ने उम्मत को सबक़ अच्छा पढ़ाया है
ये शादी ख़ाना आबादी मुबारक हो मुबारक हो
कि इस शादी में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा का साया है
वो आगे नात ख़्वानी और दुरूद-ए-पाक की कसरत
ख़ुदा-ओ-मुस्तफ़ा के ज़िक्र से शैतां भगाया है
ये आवाज़ें यक़ीनन सब्ज़ गुम्बद में भी पहुँची हैं
अहादीस-ए-नबी ने हम को ये मुژदा सुनाया है
जहेज़-ए-मुख़्तसर से फ़ातिमा की याद ताज़ा की
वलीमा की ज़ियाफ़त में अजब ही लुत्फ़ आया है
दुआ सालिक की ये है फ़ज़्ल पर फ़ज़्ल-ए-इलाही हो
रहे ये दर्स क़ायम जिस से सब ने फ़ैज़ पाया है