Phir Mujhe Aaqa Madine Mein Bulaya Shukriya
Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri
फिर मुझे आक़ा मदीने में बुलाया शुक्रिया, फिर गुम्बद-ए-ख़ज़रा दिखाया शुक्रिया
जिस जगह आठों पहर अनवार की हैं बारिशें, ऐसी नूरानी फ़ज़ाओं में बुलाया शुक्रिया
रौज़ा-ए-अनवर के ज़ाइर तुम हो शफ़ीअ, मेरी बख्शिश का बहाना यूँ बनाया शुक्रिया
फिर तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-काअबा का बख्शा है शरफ़, खूब आक़ा आब-ए-ज़म ज़म भी पिलाया शुक्रिया
मुझ से आसी को शरफ़ हज्ज का अता फ़रमा दिया, किस ज़बां से हो अदा तेरा खुदाया शुक्रिया
या इलाही! अपने प्यारे की विलादत-गाह का, बैठे मक्के में मुझे जलवा दिखाया शुक्रिया
भीक लेने के लिये या रब्ब हबीब-ए-पाक का, आस्ताना हम गरीबों को दिखाया शुक्रिया
फिर मदीने की हसीं-ओ-खूबसूरत वादियों, का हसीं-ओ-दिलकश मंज़र दिखाया शुक्रिया
मस्जिद-ए-नबवी के मेहराब और मिम्बर का शाह!, दिल नवाज़-ओ-दिलकुशा जलवा दिखाया शुक्रिया
मुँह लगाता था कहाँ दुनिया में कोई भी मुझे, ऐसे नाकारा निकम्मे को निभाया शुक्रिया
आह! तुम रोया किये उम्मत के ग़म में या नबी, हौसला हम आसियों का यूँ बढ़ाया शुक्रिया
खुद रहे भूके शिकम पर पत्थर बांधे और, प्यार से तुम ने हमें खाना खिलाया शुक्रिया
मुझ ज़लील-ओ-ख़्वार-ए-दुनिया दार की औक़ात क्या!, मैं निसार आक़ा मुझे फिर भी निभाया शुक्रिया
या रसूल अल्लाह! लोगों ने मुझे ठुकरा दिया, था मगर तू ने मुझे अपना बनाया शुक्रिया
इस क़दर लुत्फ़-ओ-इनायत अपने नाफ़रमान पर, अपने ग़म में अपनी उल्फ़त में रुलाया शुक्रिया
सुन्नतों को आम करने का मुझे जज़्बा दिया, अहले सुन्नत का मुझे खादिम बनाया शुक्रिया।
शुक्रिया क्योंकर शहा तेरे करम का हो अदा, मुझ से आसी को गुलाम अपना बनाया शुक्रिया।
मेरी इज़्ज़त अहले सुन्नत के दिलों में डाल दी, और आ'दा पर मेरा सिक्का बिठाया शुक्रिया।
दिल से जब भी अगिसनी या रसूल अल्लाह! कहा, आफ़तों से आप ने उस को बचाया शुक्रिया।
खातिमा बिलखैर हो मेरा मदीने में अगर, बाल बाल उठे पुकार अपना, खुदाया शुक्रिया।
दफ़्न कर के जब मेरे अहबाब आका चले, लहद को जलवों से आ कर जगमगाया शुक्रिया।
प्यास अभी बढ़ने भी पाई थी न मेरी हश्र में, जाम-ए-कौसर जल्द रहमत से पिलाया शुक्रिया।
ऐब महशर में घुला ही चाहते थे मैं शुमार, ढंक के पर्दा अपने दामन का छुपाया शुक्रिया।
सूए दोज़ख जब मलाइक मुझ को ले कर चल दिए, मैं तेरे सदक़े मुझे आ कर छुड़ाया शुक्रिया।
शुक्रिया क्योंकर अदा हो आप का या मुस्तफ़ा, है पड़ोसी खुल्द में अपना बनाया शुक्रिया।
गरचे शैतान हर घड़ी ईमान की है घात में, तुम ने थामा, जब कभी मैं डगमगाया शुक्रिया।
दौलते ईमान अता की अपने दामन में लिया, कुफ़्र से हम बिनवाओं को बचाया शुक्रिया।
दे दिया अत्तार को मुर्शिद ज़िया-उद-दीन सा, और सगे गौस-ओ-रज़ा इस को बनाया शुक्रिया।