Home/Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi/Qasida ba-waqt-e-zikr-e-wiladat-e-sharifa (Baraye Qayam)

क़सीदा ब-वक़्त-ए-ज़िक्र-ए-विलादत-ए-शरीफ़ा (बराए क़ियाम)

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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नबी आज पैदा हुआ चाहता है ये काबा घर इस का हुआ चाहता है अलम नसब है जिस का काबा की छत पर बुलंद इस का शोहरा हुआ चाहता है न क्यों आज काबा बने रश्क-ए-गुलशन वो गुल जलवा फ़र्मा हुआ चाहता है ये रो-रो के आपस में बुत कह रहे हैं ख़ुदा जाने अब क्या हुआ चाहता है तड़ी है समावा में सावा में ख़ुश्की नया अब ज़माना हुआ चाहता है निदा आ रही है के हक़ के क़मर का जहाँ में उजाला हुआ चाहता है