क़यामत की गर्मी

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

100%
बरोज़-ए-क़यामत हो ऐसी इनायत, रहूँ पुल पे साबित क़दम या इलाही जला दे न नार-ए-जहन्नम करम हो, पये बादशाह-ए-उमम या इलाही गुनाहों की आदत बढ़ी जा रही है, करम या इलाही करम या इलाही गुनाहों की तारिकियाँ छा गई हैं, करम या इलाही करम या इलाही चले क़ब्र में सब अकेला लिटा कर, करम या इलाही करम या इलाही नकीरैन भी क़ब्र में आ चुके हैं, करम या इलाही करम या इलाही क़यामत की गर्मी में कैसे सहूँगा, करम या इलाही करम या इलाही यहूद-ओ-नसा़रा को मगलूब कर दे, हो ख़त्म उन का ज़ोर-ओ-सितम या इलाही मुझे दोनों आलम की ख़ुशियाँ अता हों, मिटा दे ज़माने के ग़म या इलाही जो बीमार आए शिफ़ा पा के जाए, सिखा दे मुझे ऐसा दम या इलाही मैं तहरीर से दीन का डंका बजा दूँ, अता कर दे ऐसा क़लम या इलाही तू अत्तार को बे-सबब बख़्श मौला करम कर करम कर करम या इलाही