क़िस्मत मेरी चमकाइये आक़ा! मुझ को भी दर पे बलवाइये आक़ा
सीने में हो काबा तो बसे दिल में मदीना, आँखों में मेरी आप समा जाइये आक़ा
बेताब हूँ बेचैन हूँ दीदार की ख़ातिर, लिल्लाह मेरे ख़्वाब में आ जाइये आक़ा
हर सिम्त से आफ़ात-ओ-बलियात ने घेरा, मजबूर की इमदाद को अब आइये आक़ा
सकरात का आलम है शहा! दम है लबों पर, तशरीफ़ हर बहाने मेरे अब लाइये आक़ा
वहशत है अंधेरा है मेरी क़ब्र के अंदर, आ कर ज़रा रौशन इसे फ़रमाइये आक़ा
मुजरिम को लिये जाते हैं अब सू-ए-जहन्नुम, लिल्लाह! शफ़ाअत मेरी फ़रमाइये आक़ा
अत्तार पे या शाह-ए-मदीना हो इनायत, वीराना-ए-दिल आ के बसा जाइये आक़ा