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रंग-ए-चमन पसंद न फूलों की बू पसंद

Written by Allama Hasan Raza Khan

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रंग-ए-चमन पसंद न फूलों की बू पसंद सहरा-ए-तैबा है दिल-ए-बुलबुल को तू पसंद अपना अज़ीज़ वो है जिसे तू अज़ीज़ है हम को है वो पसंद जिसे आए तू पसंद मायूस हो के सब से मैं आया हूँ तेरे पास ऐ जान कर ले टूटे हुए दिल को तू पसंद हैं ख़ाना ज़ाद बंदा-ए-एहसान तो क्या अजब तेरी वो खू है करते हैं जिस को अदु पसंद क्यों न चाहें तेरी गली में हूँ मिट के ख़ाक दुनिया में आज किस को नहीं आबरू पसंद है ख़ाकसार पर करम-ए-ख़ास की नज़र आजिज़ नवाज़ है तेरी ऐ ख़ूबरू पसंद हुए ऐमन क़दम से फ़र्श ओ अर्श ओ ला-मकाँ ज़िंदा ख़ुलासा ये के सरकार आए हैं जान-ए-जहाँ हो कर तेरे दस्त-ए-अता ने दौलतें दीं दिल किए ठंडे कहीं गोहर-फ़िशाँ हो कर कहीं आब-ए-रवाँ हो कर फ़िदा हो जाए उम्मत इस हिमायत इस मोहब्बत पर हज़ारों ग़म लिए हैं एक दिल पर शादमाँ हो कर जो रखते हैं सलातीन शाही-ए-जावीद की ख़्वाहिश निशाँ क़ायम करें उन की गली में बे-निशाँ हो कर वो जिस राह से गुज़रते हैं बसी रहती है मुद्दत तक नसीब उस घर के जिस घर में वो ठहरें मेहमाँ हो कर हसन क्यों पाँव तोड़े बैठे हो तैयबा का रस्ता लो ज़मीन-ए-हिंद सरग़र्दां रखेगी आसमाँ हो कर