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रोशन है दो आलम में मह-ए-रू-ए-मुहम्मद

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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रोशन है दो आलम में मह-ए-रू-ए-मुहम्मद कोनैन है अक्स-ए-रुख़-ए-नीकू-ए-मुहम्मद ताबान है हर एक शय में रुख़-ए-पाक का जलवा हर गुल से चली आती है ख़ुशबू-ए-मुहम्मद ज़ाहिर ये हुआ आयत-ए-अल्लाह रमी से है क़ुव्वत-ए-हक़ ताक़त-ए-बाज़ू-ए-मुहम्मद जब नायब-ओ-महबूब-ए-ख़ुदा आप ही ठहरे फिर क्यों न हो हर चीज़ पे क़ाबू-ए-मुहम्मद काबे की तरफ़ कोई न सर अपना झुकाता झुकता न अगर वो सू-ए-अब्रू-ए-मुहम्मद मख़्लूक है जोया-ए-रज़ा-मंदी-ए-ख़ालिक़ अल्लाह तआला है रज़ा-जू-ए-मुहम्मद देती है दुआओं से तो ईज़ाओं का बदला क्या ख़ूब है आदत तेरी ऐ ख़ू-ए-मुहम्मद