रूसियाहों पर करम ऐ दो जहां के ताजदार
अपने ग़म मैं अपनी उल्फ़त मैं रुलाओ ज़ार ज़ार
हुस्न-ए-गुलशन मैं सरासर है फ़रेब ऐ दोस्तों!
देखना है हुस्न तो देखो अरब के रेग्ज़ार
राह भूला आह मंज़िल से भटक कर रह गया
साथ ले लो ऐ अरब के मेहरबां नाक़ा सवार
हम ग़रीबों को मदीने मैं बुला लो या नबी!
वास्ता अहमद रज़ा का दो जहां के ताजदार
गर मुक़द्दर मैं मेरे दूरी लिखी है या नबी!
काश! उल्फ़त मैं तेरी रोता रहूं मैं ज़ार ज़ार
उन का दीवाना अमामा और ज़ुल्फ़-ओ-रेश मैं
वाह! देखो तो सही लगता है कितना शानदार
काश! ख़िदमत सुन्नतों की मैं सदा करता रहूं
अहल-ए-सुन्नत का सदा बन के रहूं ख़िदमत-गुज़ार
हैं अली मुश्किल कुशा साया कुनां सर पर मेरे
ला फ़ता इल्ला अली ला सैफ़ इल्ला ज़ुल्फ़िक़ार
या शहीद-ए-कर्बला! हो दूर हर रंज-ओ-बला
अब मदद को आओ दश्त-ए-कर्बला के शह-सवार
अलमदद या ग़ौस-ए-आज़म दश्त-गीर-ए-बे-कसां
फंस गयी है नाव तूफ़ान मैं लगा दें आप पार
या मुईनुद्दीन! आओ अब मदद के वास्ते
हो करम बदहाल पर ऐ चिश्तियूँ के ताजदार
या इमाम-ए-अहमद रज़ा! सदक़ा ज़ियाउद्दीन का
हो करम की इक नज़र ऐ सुन्नियूँ के ताजदार
मुस्तफ़ा वाले तेरे अत्तार डर किस बात का
कारगर होगा ना तुझ पर दुश्मनों का कोई वार