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सद शुक्र ख़ुदाया तू ने दिया, है रहमत वाला वो आक़ा

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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सद शुक्र ख़ुदाया तू ने दिया, है रहमत वाला वो आक़ा जो उम्मत के रंज-ओ-ग़म में, रातों को अश्क बहाता रहे जब गर्मी-ए-हश्र हो ज़ोरों पर, उस वक़्त तमन्ना है सरवर! हम प्यास के मारों को कौसर, के जाम पे जाम पिलाता रहे है मेरी तमन्ना पये जहां, हर ख़ुर्द-ओ-कलां लहर एक जवां हर "दावत-ए-इस्लामी" वाला, सुन्नत का अलम लहराता रहे है तुझ से दुआ रब-ए-अकबर! मक़बूल हो "फ़ैज़ान-ए-सुन्नत" मस्जिद मस्जिद घर घर पढ़ कर, इस्लामी भाई सुनाता रहे जब मेरा यावर है सरवर, फिर डर-ए-महशर का हो क्यों नकर! वो हश्र में रुसवा कैसे करे, जो ऐब यहां पे छुपाता रहे जब तन से जुदा हो जां मुज़्तर, उस वक़्त हो जलवा पेश-ए-नज़र हो क़ब्र में भी साया गुस्तर, तू मीठी नींद सुलाता रहे या रब! यह दुआ अत्तार की है, जिस वक़्त तलक दुनिया में जिये महबूब की सुन्नत आम करे, यह डंका दीं का बजाता रहे