साहिब-ए-इज़्ज़त-ओ-जलाल आक़ा
तू है बा-अज़मत-ओ-कमाल आक़ा
हर सिफ़त तेरी लाज़वाल आक़ा
ब-यक़ीन तू है बे-मिसाल आक़ा
मैं हूँ बद-ख़ुल्क़-ओ-बद-ख़िसाल आक़ा
तुम हो ख़ुश-ख़ुल्क़-ओ-ख़ुश-मक़ाल आक़ा
रंज-ओ-ग़म ने किया निढाल आक़ा
आक़ा आक़ा मुझे संभाल आक़ा
मैं हूँ बे-रूप बे-जमाल आक़ा
कुछ नहीं ढंग और कमाल आक़ा
तेरी रहमत ही से मिली इज़्ज़त
ख़ाक मुझ में है कुछ कमाल आक़ा
क़त्ल करने अदू चढ़ा आया था
बच गया हूँ बाल-बाल आक़ा
तेरे होते हुए मेरा अब क्यों
कोई बेकार करे गा बाल आक़ा
ठोकरें दर-ब-दर की क्यों खाऊँ
तेरे दम से हूँ माला-माल आक़ा
हक़ के प्यारे हैं आप और प्यारा
आप का रब-ए-ज़ुलजलाल आक़ा
सब हसीनों से ब-यक़ीन बढ़ कर
हुस्न तेरा तेरा जमाल आक़ा
तुम ने ही सर-बुलंदियाँ बख़्शें
मुझ में कुछ भी न था कमाल आक़ा
बद-ख़साइल निकाल कर सरवर
दो बना मुझ को ख़ुश-ख़िसाल आक़ा
अपने ग़म में रुलाइये हर दम
अज़ पए हज़रत-ए-बिलाल आक़ा
मेरा सीना मदीना बन जाए
अज़ पए रब-ए-ज़ुलजलाल आक़ा
आप ने सिर्फ़ अपनी रहमत से
बख़्शी इज़्ज़त दिया जलाल आक़ा
गंदे गंदे वसाविस आते हैं
मेरे दिल से उन्हें निकाल आक़ा
याद-ए-तय्यबा में गुम रहूँ हर दम
तेरा हर दम रहे ख़याल आक़ा
अहल-ए-इस्लाम ग़ालिब आएँ और
काफ़िरों को लगे ज़वाल आक़ा
काश! इस साल में मदीने में
देखूँ रमज़ान का हिलाल आक़ा
हुस्न-ए-अख़लाक़ और नरमी दो
दूर हो ख़ू-ए-इश्तिआल आक़ा
सब्ज़ गुम्बद के साये में मेरा
काश! हो जाए इन्तेक़ाल आक़ा
लड़खड़ाए मेरे क़दम जब भी
तुम ने बढ़ कर लिया संभाल आक़ा
इस मरज़ से भी तुम शिफा दे दो
झड़ते रहते हैं मेरे बाल आक़ा
लब खुलें गुल झड़ें फ़ज़ा महके
तुम पे क़ुर्बान मैं, ख़ुश-मक़ाल आक़ा
काश! अत्तार का हो तय्यबा में
तेरे जलवों में इन्तेक़ाल आक़ा