Salaam-e-Raza

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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दुनिया मज़ार-ए-हशर जहां हैं ग़फ़ूर हैं हर मंज़िल अपने चांद की मंज़िल-ए-ग़फ़र की है उन पर दुरूद जिन को हजर तक करें सलाम उन पर सलाम जिन को तहियत शजर की है उन पर दुरूद जिन को गस-ए-बे-कसां कहें उन पर सलाम जिन को ख़बर बे-ख़बर की है जिन-ओ-बशर सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम यह बारगाह-ए-मालिक-ए-जिन-ओ-बशर की है शम्स-ओ-क़मर सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम ख़ूबी उन्हीं की जोत से शम्स-ओ-क़मर की है सब बहर-ओ-बर सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम तमलीक उन्हीं के नाम तो हर बहर-ओ-बर की है संग-ओ-शजर सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम कलमे से तर ज़बान-ए-दरख़्त-ओ-हजर की है अर्ज़-ओ-असर सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम मल्जा यह बारगाह-ए-दुआ-ओ-असर की है शोरीदा-सर सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम राहत उन्हीं के क़दमों में शोरीदा-सर की है ख़स्ता-जिगर सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम मरहम यहीं की ख़ाक तो ख़स्ता-जिगर की है सब ख़ुश्क-ओ-तर सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम यह जल्वा-गाह-ए-मालिक-ए-हर ख़ुश्क-ओ-तर की है सब गुर-ओ-फ़र सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम टोपी यहीं तो ख़ाक पे हर गुर-ओ-फ़र की है अहल-ए-नज़र सलाम को हाज़िर हैं अस्सलाम यह गर्द ही तो सुरमा सब अहल-ए-नज़र की है आंसू बहा के बह गए काले गुनाह के ढेर हाथों डुबाओ झील यहां चश्म-ए-तर की है तेरी क़ज़ा ख़लीफ़ा-ए-अहकाम-ए-ज़ुलजलाल तेरी रज़ा हलीफ़-ए-क़ज़ा-ओ-क़दर की है ये प्यारी प्यारी क्यारी तेरे ख़ाना-ए-बाग़ की सर्द इसकी आब-ओ-ताब से आतिश-ए-सक़र की है जन्नत में आ के नार में जाता नहीं कोई शुक्र-ए-ख़ुदा नवीद-ए-नजात-ओ-ज़फ़र की है