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सरकार फिर मदीने में अत्तार आ गया

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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(अलहमदुलिल्लाह २ रमज़ानुल मुबारक १४१४ हिजरी को मदीना मुनव्वरा ज़ादहल्लाहु शरफ़ा व ताज़ीमा की महकी महकी फ़ज़ाओं में पहले ही दिन यह मरूज़ा पेश करने का शरफ़ हासिल हुआ) सरकार फिर मदीने में अत्तार आ गया फिर आप का गदा शह-ए-अबरार आ गया तुम बख्शवा दो हर खता सदका हुसैन का उम्मीद-ए-मग़फ़िरत पे गुनाहगार आ गया राज़ी हमेशा के लिए हो जाइये शहा! यह दाइमी रज़ा का तलबगार आ गया होती हैं रात दिन यहाँ रहमत की बारिशें बख्शा गया जो तैयबा में बदकार आ गया दौलत की ताज-ओ-तख्त की आका नहीं तलब तुम से फ़क़त तुम्हारा तलबगार आ गया इस की बलाएं टल गईं ग़म दूर हो गए जो कोई दर पे बे-कस-ओ-नाचार आ गया आका ग़म-ए-मदीना में बे-हाल कीजिये हर कोई देख कर कहे बीमार आ गया दिल-ए-बेकरार दो मुझे आँख अश्कबार दो यह भीक लेने दर पे सरकार आ गया सोज़-ए-जिगर अता करो सीना फ़िगार दो यह भीक लेने दर पे सरकार आ गया ऐ काश! याद में तेरी रोना नसीब हो यह भीक लेने दर पे सरकार आ गया मरज़-ए-गुनाह से मुझे दीजिये शिफ़ा यह भीक लेने दर पे सरकार आ गया मुझ को बक़ी-ए-पाक में दो गज़ ज़मीन दो यह भीक लेने दर पे सरकार आ गया है ज़ाइर-ए-मदीना शफ़ाअत का मुस्तहिक़ यह भीक लेने दर पे सरकार आ गया आसी पे कीजिये करम ऐ शाफ़े-ए-उमम अत्तार मग़फ़िरत का तलबगार आ गया