Home/Muhammad Ilyas Attar Qadri/Sawal: Namaz ki talqeen se mutaliq ek nazm cassette mein suni jati hai, us mein be-namazi ki muzammat mein parhe jane wale is she'r ke bare mein hukm-e-shar'i kya hai?
सवाल: नमाज़ की तलकीन से मुतालिक एक नज़्म कैसेट में सुनी जाती है, उस में बे-नमाज़ी की मज़म्मत में पढ़े जाने वाले इस शेर के बारे में हुक्म-ए-शरई क्या है?
"जब रोज़-ए-हश्र तख़्त पे बैठेगा किब्रिया" कहना कैसा?
जब रोज़-ए-हश्र तख़्त पे बैठेगा किब्रिया उस वक़्त क्या कहोगे तुम्हें आएगी हया
शर्म-ओ-हया से उस घड़ी सर को झुकाओगे जन्नत तो क्या मिलेगी जहन्नम में जाओगे
जवाब: "जब रोज़-ए-हश्र तख़्त पे बैठेगा किब्रिया" ये अल्फ़ाज़ कुफ़्रिया हैं। फ़ुक़हा-ए-किराम रहिमहुमल्लाह अस्सलाम फ़रमाते हैं: जो कहे: अल्लाह अज़्ज़वजल इंसाफ़ के लिए बैठाया खड़ा हो गया उस पर हुक्म-ए-कुफ़्र है। (फ़तावा-ए-तातार खानिया ज ५ स ४६६) इस मिसरे को अगर यूँ पढ़ लें तो शेर दुरुस्त हो जाएगा: "तुम को बरोज़-ए-हश्र जो पूछेगा किब्रिया" (कुफ़्रिया कलिमात के बारे में सवाल जवाब स २४२ मकतबतुल मदीना)