नबी की नींद पर उस ने नमाज़-ए-असर क़ुर्बान की
जो हाज़िर कर चुका था उस से पहले जान का हदिया
ना क्योंकर लौटा उस के लिए डूबा हुआ सूरज
के जब उस चाँद के पहलू में इक सूरज का था जलवा
तआला अल्लाह तेरी शौकत तेरी सौलत का क्या कहना
के खुतबा पढ़ रहा है आज तक खैबर का हर ज़र्रा
मुसलमानो रसूल-अल्लाह की उल्फ़त अगर चाहो
करो इसकी गुलामी जिस का हर मोमिन हुआ बंदा
हो चिश्ती कादरी या नक़्शबंदी सुहरवर्दी हो
मिला सब को विलायत का इन्हीं के हाथ से टुकड़ा
है सदक़ा-ए-मेल फिर इस पाक सुथरे को रवां क्यों हो
कि दुनिया खा रही है जिस की आल-ए-पाक का सदक़ा
अली मुश्किल-कुशा हैं सब के सालिक का सहारा हैं
हर एक मोहताज उन का हो जवां बूढ़ा हो या बच्चा