सूरत मत भूलना पिया हमारी
तुमरी ही इक आस है हम तुमरे वारी
पी नगरी की पहली मंज़िल सीखें छोड़ी साथी
इस घूँघट की लाज है अब तू पिया तुम्हारे हाथ
फ़न-ए-अरूज़ के एतबार से ये मिसरा ग़ैर मौज़ूँ है और तमाम दस्तियाब नुस्ख़ों में इसी तरह है। वल्लाहू आलम बिस-सवाब।
आख़िरत की पहली मंज़िल क़ब्र है वहाँ ही सब ने साथ छोड़ दिया तो आगे क्या काम आवेंगे आक़ा इन ऐबों को तुम ही छिपाना। (दीवान-ए-सालिक के नुस्ख़ों में इस बैत के दोनों मिसरे यूँ हैं:
पी नगरी की पहली मंज़िल सीखें छोड़ी साथी
इस घूँघट की लाज है अब पिया तुम्हारे हाथ
फ़न-ए-अरूज़ के एतबार से ये दोनों ग़ैर मौज़ूँ हैं जिस की वज़ह यक़ीनन किताबत की ग़लती है, लिहाज़ा हम से जो सही हो सकी इस के मुताबिक़ इन दोनों मिसरों को ऊपर कलाम में लिखा गया है। -अल-मदीनतुल इल्मिया)
खेल कूद में उमर गवाई सौ काये दिन रैन
जब पी घर से आई पलकियां टप टप टपक नैन
सीस पे गठड़ी डगर केटिळी घायल मोरे पाओं
प्यारे तुम ही संभालियो जब डगमग में हो जाऊं
तुम कुछ कर पा करो तो सालिक बुरा भला बन जाए
खोटा खरा न देखे पारस कुन कुंदन सभी बनाए
तेल जो निबड़े बत्ती बजरे दिया मेरा बढ़ जाए
सांचे सूरज ज्योत तुम्हारी सालिक पे पड़ जाए