सोया हुआ नसीब जगा दीजिये हुज़ूर
मीठा मदीना मुझ को दिखा दीजिये हुज़ूर
अब "चल मदीना" का मुझे मुर्दह सुनाइये
रोते हुए को अब तो हँसा दीजिये हुज़ूर
फिर सब्ज़ गुंबद और वो मीनार की बहार
गौस-ओ-रज़ा का सदक़ा दिखा दीजिये हुज़ूर
मस्कीन हूँ, ग़रीब हूँ पल्ले नहीं है कुछ
ख़र्चा सफ़र का दीजिये ना दीजिये हुज़ूर
अरफ़ात और मुज़दलिफ़ह और मिना चलूँ
हज कर लूँ हक़ से इज़्न दिला दीजिये हुज़ूर
ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीन के सदक़े में या नबी!
ख़्वाबों में अपना जलवा दिखा दीजिये हुज़ूर
साइल ग़म-ए-मदीना का हूँ शाह-ए-बह्र-ओ-बर
मुझ को ग़म-ए-मदीना शहा दीजिये हुज़ूर
अहमद रज़ा का वास्ता उल्फ़त का साक़िया
मुझ को छलकता जाम पिला दीजिये हुज़ूर
हर वक़्त सोज़-ए-इश्क़ में तड़पा करूँ शहा
आग ऐसी मेरे दिल में लगा दीजिये हुज़ूर
ज़हरा के लाडलों का वसीला मैं लाया हूँ
पुर-सूदा दिल को मेरे खिला दीजिये हुज़ूर
सदक़ा शहीद-ए-कर्बला का शाह-ए-अंबिया
दीवाना मदीना बना दीजिये हुज़ूर
या मुस्तफ़ा मैं उल्फ़त-ए-दुनिया में फँस गया
इस क़ैद से ख़ुदारा छुड़ा दीजिये हुज़ूर
पुर-ख़ार वादियों में भटक मैं रह गया
भूले हुए को राह दिखा दीजिये हुज़ूर
तौबा निबाह में नहीं पाता हूँ या नबी!
अब इस्तिक़ामत आप शहा दीजिये हुज़ूर
डर लग रहा है आह! जहन्नम की आग से
बख़्शिश का मुझ को मुर्दह सुना दीजिये हुज़ूर
"क़फ़्ल-ए-मदीना" दीजिये मुरशद का वास्ता
ख़ामोश रहना मुझ को सिखा दीजिये हुज़ूर
अत्तार बद-ख़िसाल का इसियाँ शियार का
दिल-ए-मुर्दह हो चुका है जला दीजिये हुज़ूर
या रसूल अल्लाह! तेरे चाहने वालों की खैर
सब गुलामों का भला हो सब करें तैबा की सैर
काशके हिज्र-ए-मदीना मुझ को रखे बे-करार
चैन ही आए न मुझ को याद-ए-तैबा के बगैर
या नबी अब तो मदीने में मुझे बुलवाइए
हो मुयस्सर बा-अदब फिर आप की गलियों की सैर
काश! तैबा में शहादत का अता हो जाए जाम
जल्वा-ए-महबूब में अंजाम मेरा हो बखैर
फालतू बातों की आदत दूर हो जाए हुज़ूर!
हो ज़बां पर मेरी अक्सर आप ही का ज़िक्र-ए-खैर
आ-इद आक़ा फ़र्द-ए-इसयां हो गई कर दे करम
कौन है जो बख्शवाए गा मुझे तेरे बगैर
तेज़ है तलवार की भी धार से ये पुल-ए-सिरात
तुम सम्हाला दो कहीं फिसल मेरा न पैर
उम्मत-ए-महबूब का या रब बना दे खैर-ख्वाह
नफ़्स की खातिर किसी दिल में मेरे हो न बैर
जाम ऐसा अपनी उल्फत का पिला दे साक़िया
ना'त सुन कर हालत-ए-अत्तार हो रो रो के गैर