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तमहीद-ए-ज़िक्र-ए-मेराज-ए-शरीफ़

Written by Allama Hasan Raza Khan

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साक़ी कुछ अपने बादा-कशों की ख़बर भी है हम बे-कसों के हाल पे तुझ को नज़र भी है जोश-ए-अतश भी शिद्दत-ए-सोज़-ए-जिगर भी है कुछ तल्ख़ कामियों में कुछ दर्द-ए-सर भी है ऐसा अता हो जाम-ए-शराब-ए-ज़ुहूर का जिस के ख़ुमार में भी मज़ा हो सुरूर का अब देर क्या है बादा-ए-इरफ़ान क़वाम दे ठंडक पड़े कलेजा में जिस से वो जाम दे ताज़ा हो रूह प्यास मुझे लुत्फ़-ए-ताम दे ये तिश्ना काम तुझ को दुआएँ मुदाम दे उठें सुरूर आएँ मज़े झूम झूम कर हो जाऊँ बे-ख़बर लब-ए-साग़र को चूम कर हर हर गली है मश्रिक-ए-खुर्शीद-ए-नूर से लिप्टी है हर निगाह तजल्ली-ए-तूर से रोहत है सब के मुँह पे दिलों के सुरूर से मुर्दे हैं बे-करार हिजाब-ए-कुबूर से माह-ए-अरब के जलवे जो ऊँचे निकल गए खुर्शीद ओ माहताब मुकाबिल से टल गए हर सम्त से बहार-ए-नवा ख्वानीयों में है नैसान-ए-जूद-ए-रब गौहर अफ़शानीयों में है चश्म-ए-कलीम जलवे के कुर्बानियों में है गुल आमद-ए-हज़ूर का रूहानीयों में है इक धूम है हबीब को मेहमान बुलाते हैं बहर-ए-बुराक खुल्द को जिब्रील जाते हैं