साक़ी कुछ अपने बादा-कशों की ख़बर भी है
हम बे-कसों के हाल पे तुझ को नज़र भी है
जोश-ए-अतश भी शिद्दत-ए-सोज़-ए-जिगर भी है
कुछ तल्ख़ कामियों में कुछ दर्द-ए-सर भी है
ऐसा अता हो जाम-ए-शराब-ए-ज़ुहूर का
जिस के ख़ुमार में भी मज़ा हो सुरूर का
अब देर क्या है बादा-ए-इरफ़ान क़वाम दे
ठंडक पड़े कलेजा में जिस से वो जाम दे
ताज़ा हो रूह प्यास मुझे लुत्फ़-ए-ताम दे
ये तिश्ना काम तुझ को दुआएँ मुदाम दे
उठें सुरूर आएँ मज़े झूम झूम कर
हो जाऊँ बे-ख़बर लब-ए-साग़र को चूम कर
हर हर गली है मश्रिक-ए-खुर्शीद-ए-नूर से
लिप्टी है हर निगाह तजल्ली-ए-तूर से
रोहत है सब के मुँह पे दिलों के सुरूर से
मुर्दे हैं बे-करार हिजाब-ए-कुबूर से
माह-ए-अरब के जलवे जो ऊँचे निकल गए
खुर्शीद ओ माहताब मुकाबिल से टल गए
हर सम्त से बहार-ए-नवा ख्वानीयों में है
नैसान-ए-जूद-ए-रब गौहर अफ़शानीयों में है
चश्म-ए-कलीम जलवे के कुर्बानियों में है
गुल आमद-ए-हज़ूर का रूहानीयों में है
इक धूम है हबीब को मेहमान बुलाते हैं
बहर-ए-बुराक खुल्द को जिब्रील जाते हैं