शुक्र-ए-ख़ुदा-ए-बुज़ुर्ग-ओ-बरतर
आज मुरादें दिल की आईं
ग़ुंचे चहके गुलशन महके
सर पे घटाएं नूर की छाएं
ख़ूब कलाम छुपा नअतिया
हो मक़बूल ख़ुदाया आएं
इस का सिला उस्ताद-ए-मुकर्रम
पाएं ब-हक़्क़-ए-ताहा यासीन
तब्अ का सन बरजस्ता लिख दे
अहमद रिज़वी शम्स मज़ाईं
१३२१ हिजरी