तरजी-ए-बंद

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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न क्योंकर मदीने पे मक्का हो क़ुर्बान के हैं जलवा-गर उस में महबूब-ए-यज़दां बरसते हैं हर वक़्त अनवार-ए-सुबहां है हर एक गोशा वहां का गुलस्तां अजब दिल-कुशा हैं मदीने की गलियां मुअत्तर हैं यूँ जैसे फूलों की कलियां सर-ए-तूर पर थे जो जलवे नुमायां हैं अनवार वो ही यहां पर दरख़्शां जनाब-ए-कलीम आ के देखें अगर यां कहें गश में आ कर के या रब्ब तेरी शां अजब दिल-कुशा हैं मदीने की गलियां मुअत्तर हैं यूँ जैसे फूलों की कलियां