न क्योंकर मदीने पे मक्का हो क़ुर्बान
के हैं जलवा-गर उस में महबूब-ए-यज़दां
बरसते हैं हर वक़्त अनवार-ए-सुबहां
है हर एक गोशा वहां का गुलस्तां
अजब दिल-कुशा हैं मदीने की गलियां
मुअत्तर हैं यूँ जैसे फूलों की कलियां
सर-ए-तूर पर थे जो जलवे नुमायां
हैं अनवार वो ही यहां पर दरख़्शां
जनाब-ए-कलीम आ के देखें अगर यां
कहें गश में आ कर के या रब्ब तेरी शां
अजब दिल-कुशा हैं मदीने की गलियां
मुअत्तर हैं यूँ जैसे फूलों की कलियां