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Tazmeen bar nazm mansoob ba Zain-ul-Abideen (R.A)

Written by Mufti Ahmad Yar Khan Naeemi

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ऐसा कोई महरम नहीं पहुंचाए जो पैगाम-ए-ग़म तू ही करम कर दे तुझे शाह-ए-मदीना की क़सम हो जब कभी तेरा गुज़र बाद-ए-सबा सू-ए-हरम पहुंचा मेरी तस्लीम उस जा हैं जहां खैर-उल-उमम इन निल्ति या रीह-अस-सबा यौमन इला अर्ज़-इल-हरम बल्लिग़ सलामी रौज़तन फ़ीहा नबियुल मुह्तशम मैं दूं तुझे उन का पता गर न तू पहचाने सबा हक़ ने उन्हीं के वास्ते पैदा किए अर्ज़-ओ-समा रुख़सार-ए-सूरज की तरह है चेहरा उन का चांद सा है ज़ात-ए-आलम की पना और हाथ दरिया जूद का मन वजहुहू शम्सुद दुहा मन खद्दुहू बदरुद दुजा मन ज़ातुहू नूरुल हुदा मन कफ़्फ़ुहू बह्रुल हिमम हक़ ने उन्हें रहमत कहा और शाफ़े-ए-असीयां किया रुतबा में वो सब से सिवा हैं ख़त्म उन से अंबिया सब अव्वलीन-ओ-आख़िरीन तारे हैं तुम मेहर-ए-मुबीन ये जगमगाए रात भर चमके जो तुम कोई नहीं अकबादना मजरोहतुन मिन सैफ़ि हजरिल मुस्तफ़ा तूबा लि अहली बलदतिन फ़ीहन नबीयुल मुहतशम ऐ दो जहाँ पर रहम-ए-हक़ तुम हो शफ़ी-उल-मुजरिमीन है आप ही का आसरा जब बोलें नफ़सी मुरसलीन इस बेकसी के वक़्त में जब कोई भी अपना नहीं हम बेकसों पर हो नज़र ऐ रहमतुल-लिल-आलमीन या रहमतल-लिल-आलमीन अन्त शफ़ी-उल-मुज़िनबीन अकरिम लना यौमल हज़ीन फ़ज़लन व जूदं व अल-करम इस सालिक-ए-बदकार का गो हश्र में कोई नहीं लेकिन उसे क्या ख़ौफ़ हो जब आप हैं इसके मुईं मुजरिम हूँ मैं ग़फ़्फ़ार रब और तुम शफ़ी-उल-मुज़िनबीन फिर क्यों कहूँ बेकस हूँ या रहमतुल-लिल-आलमीन या रहमतल-लिल-आलमीन अद्रिक लिज़ैनिल आबिदीन महबूसु अयदिज़ ज़ालिमीन फ़ी मरकबिन वल मुज़दहम