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Teri Aamad Hai Maut Aayi Hai

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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तेरी आमद है मौत आयी है जान-ए-ईसा तेरी दुहाई है क्यों वतन अपना छोड़ आयी है क्यों सफ़र की बला उठायी है सैकड़ों आफ़तों में फंसने को क्यों बदन में ये जान आयी है उन के जलवे हैं मेरी आँखों में अच्छी साअत से मौत आयी है तुम को देखा तो दम में दम आया आप आए कि जान आयी है मर रहा था तुम आए जी उठा मौत क्या आयी जान आयी है अब तो आओ कि दम लबों पर है चेहरे पर मुर्दनी भी छाई है आये वक़्त है ये आने का देख लें सब की जां फिर आई है ज़िंदगी मैंने पाई मर मर के मैं ने जी जी के मौत पाई है ज़िंदगी क्या थी जिस में मौत आई ज़िंदगी बाद-ए-मर्ग पाई है मौत का अब नहीं ज़रा घिटका ज़िंदगी शुभ घड़ी से पाई है मरते ही ज़िंदगी मिली मुझ को मौत के साथ जान आई है हसरत-ए-दीद-ए-यार में हम ने आज मर मर के मौत पाई है जो हसीं देखा मर मिटा उस पर मैं ने मर के हयात पाई है चैन की नींद आज सोया हूँ मौत आराम की सिलाई है शामतों ने तुम्हारी घेरा है मौत तुम को यहां पे लाई है ज़िबह कर डाला तू ने ओ ज़ालिम नफ़्स तो तू ज़रा क़साई है ताअत-ए-हक़ का नाम सुनते ही तुझ को कम-बख़्त मौत आई है मासियत ज़हर है मगर औंधे तू ने समझा उसे मिठाई है क्या बिगाड़ा था तेरा क्यों बिगड़ा ज़हर की प्याली क्यों पिलाई है अच्छे जो काम करने हैं करलो जान अपनी नहीं पराई है नूरी हरगिज़ नहीं है तू नारी मौत-ए-इस्लाम तू ने पाई है वाह क्या बात आप की नूरी क्या ही अच्छी ग़ज़ल सुनाई है