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Tumhara karam Ya Habib-e-Khuda hai

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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तुम्हारा करम याहबीब-ए-ख़ुदा है, मदीने की जानिब चला क़ाफ़िला है मैं राह-ए-मदीना के क़ुर्बान जाऊँ, कि इस में सुरूर और मज़ा ही मज़ा है मदीने में "कुफ़्ल-ए-मदीना" लगाऊँ, करम आप कीजे इरादा मेरा है इबादत से ख़ाली है आमाल-नामा, सिवा आँसुओं के मेरे पास क्या है ना क्यों तुम पे इतराए मुजरिम तुम्हारा, यहाँ तो अदू भी अमाँ पा रहा है नहीं जानता ये मदीने के आदाब, ये तेरा भला या बुरा है मुझे दीजिये अश्कबार आँख आक़ा, ये दिल सख़्त, पत्थर से भी हो गया है पिला दे छलकता हुआ जाम-ए-उल्फ़त, नज़र तेरी जानिब लगी साक़िया है मदद के लिये नाख़ुदा आइए अब, सफ़ीना हमारा भँवर में फँसा है शह-ए-क़ाफ़िला के सभी ज़ायरों ने, मेरे साथ अहद-ए-वफ़ा कर लिया है तुम्हें लाज अहद-ए-वफ़ा की रखो गे, कि इब्लीस-ए-मरदूद पीछे लगा है शफ़ाअत की ख़ैरात लेने को अत्तार, लिये क़ाफ़िला अनक़रीब आ रहा है मुस्तफा ने हमारे ऐबों पर, पर्दा दामन का डाल रखा है शुक्र यह तुम ने आल का सदक़ा, मेरी झोली में डाल रखा है "चल मदीना" की भीख मिल जाए, आशिकों ने सवाल रखा है देदो ज़ादे सफ़र मदीने का, साईलॉन ने सवाल रखा है देखो दीवानो! सब्ज़ गुम्बद में, कैसा हुस्न-ओ-जमाल रखा है क्यों जहन्नम में जाऊँ सीने में, इश्क़े-असाबो-आल रखा है मैं कभी का भटक गया होता, आप ही ने सम्भाल रखा है आशिके-माल इस में सोच आखिर, क्या उरूजो-कमाल रखा है तुझ को मिल जाए गा जो किस्मत में, तेरी रिज़्क़े-हलाल रखा है इस जहाँ के कमाल में बेशक, इक ना इक दिन ज़वाल रखा है तुझ से आक़ा तेरे सवाली ने, मग़फ़िरत का सवाल रखा है सुन लो शैतान ने हर सू शहवत का, खूब फैला के जाल रखा है जीती है वो जिस ने सुन्नत के, खुद को साँचे में ढाल रखा है