तुम्हारे मुक़द्दर पे रश्क आ रहा है, मदीने का तुम को बुलावा मिला है
ख़ुदा और नबी का करम हो गया है, सफ़र सू-ए-तैयबा मेरी आल का है
सभी बच्चियों के बहमराह मां बाप, चला हज्ज को नन्हा सा ये क़ाफ़िला है
ख़ुदा-ए-मुहम्मद हो हामी-ओ-नासिर, सफ़र ख़ैरियत से हो मेरी दुआ है
ज़बान और आंखों का कुफ़्ल-ए-मदीना, लगा लो तुम्हारा इसी में भला है
तुम एहराम में ख़ूब लब्बैक पढ़ना, सवाब इस में ला-रैब हद से सिवा है
हिजाज़-ए-मुक़द्दस की गलियों में हरगिज़, ना तुम थूकना ये मेरी इल्तिजा है
अदब ख़ूब मक्के मदीने का करना, यही औलिया का तरीक़ा रहा है
जो है बा-अदब वो बड़ा बा-नसीब और, जो है बे-अदब वो निहायत बुरा है
नज़र प्यारे काबे पे पहली पड़े जब, तो रो रो के करना दुआ मशवरा है
वहां ख़ूब रो रो के करना दुआएं, कि दर हर घड़ी रहमतों का खुला है
नज़र सब्ज़ गुम्बद को जिस वक़्त चूमे, अदब से झुका लेना सर इल्तिजा है
दुरूद-ओ-सलाम और ना'अतों की धूमें, मचाना कि ये रूह-ओ-दिल की गिज़ा है
इबादत रियाज़त तिलावत से ग़फ़लत, ना करना कि मौक़ा सुनहरी मिला है
मदीने में मक्के में एक एक क़ुरआन, जो करता है ख़त्म उस की तो बात क्या है!
ख़रीदारीयों में तुम अनमोल औक़ात, ना हरगिज़ गँवाना मेरा मशवरा है
बहुत खाने पीने से परहेज़ करना, कि बिसयार ख़ोरी में नुक़सान बड़ा है
परेशानियों में ज़बां बंद रखना, कए जाना सब्र अज़्र इस में बड़ा है
कोई झाड़ दे तब भी नरमी बरतना, कए जाना सब्र अज़्र इस में बड़ा है
गो आफ़ात-ओ-अमराज़ डेरा जमाएं, कए जाना सब्र अज़्र इस में बड़ा है
तवाफ़-ओ-सई गरचे तुम को थका दें, कए जाना सब्र अज़्र इस में बड़ा है
मिना और अरफ़ात में भीड़ होगी, कए जाना सब्र अज़्र इस में बड़ा है
दुआओं में अत्तार को याद रखना
सलाम उन से कहना यही इल्तिजा है