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उमंगें जोश पर आईं इरादे गुदगुदाते हैं

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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उमंगें जोश पर आईं इरादे गुदगुदाते हैं जमील क़ादरी शायद हबीब-ए-हक़ बुलाते हैं जगाते हैं क़िस्मत चाहते हैं जिस की दम भर में वह जिस को चाहते हैं अपने रौज़े पर बुलाते हैं उन्हें मिल जाता है गोया वह साया-ए-अर्श-ए-आज़म का तेरी दीवार के साया में जो बिस्तर जमाते हैं मुक़द्दर उस को कहते हैं फ़रिश्ते अर्श से आ कर ग़ुबार-ए-फ़र्श-ए-तैयबा अपनी आँखों में लगाते हैं ख़ुदा जाने कि तैयबा को हमारा कब सफ़र होगा मदीने को हज़ारों क़ाफ़िले हर साल जाते हैं