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Un Ki Mehak Ne Dil Ke Ghunchay Khila Diye Hain

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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उन की महक ने दिल के ग़ुंचे खिला दिए हैं जिस राह चल गए हैं कूचे बसा दिए हैं जब आ गई हैं जोश-ए-रहमत पे उन की आँखें जलते बुझा दिए हैं रोते हँसा दिए हैं एक दिल हमारा क्या है आज़ार इस का कितना तुम ने तो चलते फिरते मुर्दे जला दिए हैं उन के निसार कोई कैसे ही रंज में हो जब याद आ गए हैं सब ग़म भुला दिए हैं हम से फ़क़ीर भी अब फेरेंगे उठते होंगे अब तो ग़नी के दर पर बिस्तर जमा दिए हैं इसरा में गुज़रे जिस दम बीड़े पे क़ुदसियों के होने लगी सलामी परचम झुका दिए हैं आने दो या डुबो दो अब तो तुम्हारी जानिब कश्ती तुम्हीं पे छोड़ी लंगर उठा दिए हैं दूल्हा से इतना कह दो प्यारे सवारी रोको मुश्किल में हैं बराती पुर-ख़ार बादिए हैं अल्लाह क्या जहन्नम अब भी न सर्द होगा रो रो के मुस्तफ़ा ने दरिया बहा दिए हैं मेरे करीम से गर क़तरा किसी ने माँगा दरिया बहा दिए हैं दुर-ए-बे-बहा दिए हैं मुल्क-ए-सुख़न की शाही तुम को रज़ा मुसल्लम जिस सिम्त आ गए हो सिक्के बिठा दिए हैं है लब-ए-ईसा से जाँ बख्शी ज़रा ली हाथ में संग-रेज़े पाते हैं शीरीं मक़ाली हाथ में बे-नवाओं की निगाहें हैं कहाँ तहवीर-ए-दस्त रह गईं जो पा के जूद-ए-ला-याज़ाल हाथ में क्या लकीरों में यदुल्लाह ख़त सर-ओ-आसा लिखा राह यूँ उस राज़ लिखने की निकाली हाथ में जूद-ए-शाह-ए-कौसर अपने प्यासों का जोया है आप क्या अजब उड़ कर जो आ आए प्याली हाथ में अब्र-ए-निसान मोमिनों को तेग़-ए-उरयां कुफ़्र पर जम्अ हैं शान-ए-जमाली व जलाली हाथ में मालिक-ए-कौनैन हैं गो पास कुछ रखते नहीं दो जहाँ की नेमतें हैं उन के ख़ाली हाथ में साया अफ़गन सर पे हो परचम-ए-इलाही झूम कर जब लिवा-उल-हम्द ले उम्मत का वाली हाथ में हर ख़त-ए-कफ़ है यहाँ ऐ दस्त-ए-बैज़ा-ए-कलीम मौजज़न दरिया-ए-नूर-ए-बे-मिसाली हाथ में वो गिरां संगी-ए-क़द-ए-मस वो अरज़ानी-ए-जूद नओइया बदला किए संग-ओ-लाली हाथ में दस्तगीर-ए-हर दो आलम कर दिया सिब़्तैन को ऐ मैं क़ुर्बान जान-ए-जाँ अंगुश्त-ए-ख़याली हाथ में आह वो आँखें कि आँखें बंद और लब पर दुरूद वक़्त-ए-संग-ए-दर-ए-रौज़ा की जाली हाथ में जिस ने बैअत की बहार-ए-हुस्न पर क़ुर्बान रहा हैं लकीरें नक़्श-ए-तसखीर-ए-जमाली हाथ में काश हो जाऊँ लब-ए-कौसर में यूँ वारफ़्ता होश ले कर उस जान-ए-करम का ज़ैल-ए-आली हाथ में आँख मह्व-ए-जल्वा-ए-दीदार दिल पुर जोश-ए-वजद लब पे शुक्र-ए-बख्शिश-ए-साक़ी प्याली हाथ में हश्र में क्या मज़े वारफ़्तगी के लूँ रज़ा लूट जाऊँ पा के वो दामन-ए-आली हाथ में