वक़्त-ए-सहरी का हो गया जागो नूर हर सम्त छा गया जागो
उठो सहरी की कर लो तैयारी रोज़ा रखना है आज का जागो
माह-ए-रमज़ान के फ़र्ज़ हैं रोज़े एक भी तुम न छोड़ना जागो
उठो उठो वज़ू भी कर लो और तुम तहज्जुद करो अदा जागो
फुस्कियां गर्म चाय की भर लो खा लो हल्की सी कुछ ग़िज़ा जागो
होगी मक़बूल फ़ज़्ल-ए-मौला से खा के सहरी करो दुआ जागो
माह-ए-रमज़ान की बरकतें लूटो लूट लो रहमत-ए-ख़ुदा जागो
खा के सहरी उठो अदा कर लो सुन्नत-ए-शाह-ए-अंबिया जागो
तुम को मौला दिखाए और हज्ज भी करो अदा जागो
तुम को रमज़ान के सदक़े मौला दे उल्फ़त-ओ-इश्क़-ए-मुस्तफ़ा जागो
तुम को रमज़ान का मदीने में दे शरफ़-ए-रब-ए-मुस्तफ़ा जागो
कैसी प्यारी फ़ज़ा है रमज़ान की देख लो कर के आँख वा जागो
रहमतों की झड़ी बरसती है जल्द उठ कर के लो नहा जागो
तुम को दीदार-ए-मुस्तफ़ा हो जाए है ये अत्तार की दुआ जागो