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Wasl-e-Chaharam dar Manaqibat-e-A'da wa Isti'anat az Aqa Radi Allahu Ta'ala Anhu

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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अल-अमां क़हर है ऐ ग़ौस वो तीखा तेरा मर के भी चैन से सोता नहीं मारा तेरा बादलों से कहीं रुकती है कड़कती बिजली ढालें छट जाती हैं उठता है जो तेग़ा तेरा अक्स का देख के मुँह और फिर जाता है चार आईना के बल का नहीं नेज़ा तेरा कोह सर मुख हो तो एक वार में दो पर काले हाथ पड़ता ही नहीं भूल के ओछा तेरा इस पे यह क़हर कि अब चंद मुखालिफ़ तेरे चाहते हैं कि घटा दें पाया तेरा अक़्ल होती तो ख़ुदा से न लड़ाई लेते यह घटाएं उसे मंज़ूर बढ़ाना तेरा वरफ़अना ल-क ज़िक्रक का है साया तुझ पर बोल बाला है तेरा ज़िक्र है ऊँचा तेरा मिट गए मिट जाएंगे मिट जाएंगे आ'दा तेरे न मिटा है न मिटेगा कभी चर्चा तेरा तू घटाए से किसी के न घटा है न घटे जब बढ़ाए तुझे अल्लाह तआला तेरा सम-ए-क़ातिल है ख़ुदा की क़सम उन का इनकार मुन्किर-ए-फ़ज़्ल-ए-हुज़ूर आह यह लिखा तेरा मेरे सय्याफ़ के ख़ंजर से तुझे बाक नहीं चीर कर देखे कोई आह कलीजा तेरा इब्न-ए-ज़हरा तेरे दिल में हैं यह ज़हर भरे बल बे आओ मुन्किर-ए-बेबाक यह ज़हरा तेरा बाज़-ए-अशहब की ग़ुलामी से यह आँखें फिरनी देख उड़ जाएगा ईमान का तोता तेरा शाख़ पर बैठ के जड़ काटने की फ़िक्र में है कहीं नीचा न दिखाए तुझे शजर तेरा हक़ से बद हो के ज़माना का भला बनता है अरे मैं ख़ूब समझता हूँ मुअम्मा तेरा सग़-ए-दर-ए-क़हर से देखे तो बिखरता है अभी बंद बंद बदन ऐ रू-ब-दुनिया तेरा ग़रज़ आक़ा से करूँ अर्ज़ कि तेरी है पनाह बंदा मजबूर है ख़ातिर पे है क़ब्ज़ा तेरा हुक्म नाफ़िज़ है तेरा ख़ामा तेरा सैफ़ तेरी दम में जो चाहे करे दूर है शाहा तेरा जिस को ललकार दे आता हो तो उल्टा फिर जाए जिस को चमकार ले हर फिर के वो तेरा तेरा कुन्‍हियां दिल की ख़ुदा ने तुझे दें ऐसी कर कि यह सीना हो मोहब्बत का ख़ज़ीन तेरा दिल पे कुन्दा हो तेरा नाम कि वो दुज़द-ए-रजीम उलटे ही पांव फिरे देख के तुग़रा तेरा नज़अ में, गोर में, मीज़ान पे, सर-ए-पुल पे कहीं न छूटे हाथ से दामन-ए-मुअल्ला तेरा धूप महशर की वो जाँ सोज़-ए-क़यामत है मगर मुतमइन हूँ कि मेरे सर पे है पल्ला तेरा बहजत उस सर की है जो 'बहजतुल असरार' में है कि फ़लक वार मुरीदों पे है साया तेरा ऐ रज़ा चीस्त ग़म अर जुमला जहाँ दुश्मन तुस्त कर्दा-अम मामिन-ए-ख़ुद क़िबला-ए-हाजत-ए-रा