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Wasl-e-Dom Dar Manqabat-e-Aqa-e-Akram Huzoor Ghaus-e-Azam Razi Allahu Ta'ala Anhu

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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वाह क्या मर्तबा ऐ ग़ौस है बाला तेरा ऊंचे ऊंचों के सरों से क़दम आला तेरा सर भला क्या कोई जाने कि है कैसा तेरा औलिया मिलते हैं आंखें वो है तलवा तेरा क्या दबे जिस पे हिमायत का हो पंजा तेरा शेर को ख़तरे में लाता नहीं गुत्ता तेरा तू हुसैनी हसनी क्यों न मोहि-उद-दीन हो ऐ ख़िज़्र मजम-ए-बहरैन है चश्मा तेरा क़समें दे दे के खिलाता है पिलाता है तुझे प्यारा अल्लाह तेरा चाहने वाला तेरा मुस्तफ़ा के तन-ए-बे-साया का साया देखा जिस ने देखा मेरी जां जल्वा-ए-ज़ेबा तेरा सय्यिदुना रज़ी अल्लाह तआला अन्हु फ़र्मुदा कि मरमी फ़रमायन्द: या अब्दुल क़ादिरी बिहक़्क़ी अलैका कुल व बिहक़्क़ी अलैका इश्रब.. अलख १२ मिन्ह इब्न-ए-ज़हरा को मुबारक हो उर्स-ओ-क़ुदरत क़ादिरी पाएं तसद्दुक़ मेरे दूल्हा तेरा क्यों न क़ासिम हो कि तू इब्न-ए-अबी-उल-क़ासिम है क्यों न क़ादिर हो कि मुख़्तार है बाबा तेरा नबवी मींह अलवी फ़स्ल बतौली गुलशन हसनी फूल हुसैनी है महकना तेरा नबवी ज़िल्ल अलवी बुर्ज बतौली मंज़िल हसनी चांद हुसैनी है उजाला तेरा नबवी हूर अलवी कोह बतौली मअदन हसनी लअल हुसैनी है तजल्ला तेरा बह्र-ओ-बर शहर-ओ-क़ुरा सहल-ओ-हज़ून दश्त-ओ-चमन कौन से चक पे पहुंचता नहीं दावा तेरा हुस्न-ए-नियत हो ख़ता फिर कभी करता ही नहीं आज़माया है यगाना है दुगाना तेरा हज़रत शैख़ मोहि-उद-दीन अब्दुल क़ादिर रज़ी अल्लाह तआला अन्हु ज़रा अवाइल-ए-उमर असहाब रा मी फ़रमूद कि औलिया-ए-इराक़ मरा तस्लीम कर्दा अंद, बाद अज़ मुद्दत-ए-फ़रमूद कि ईं ज़मान जमीअ ज़मीन-ए-शर्क़-ओ-ग़र्ब-ओ-बर-ओ-बह्र-ओ-सहल-ओ-हज़ून मरा तस्लीम कर्दा अंद, व पीच वली अज़ औलिया न मांद दर आं वक़्त मगर आं कि बर शैख़ आमद व तस्लीम कर्द व राह-ए-क़ुत्वियत १२ तोहफ़ा क़ादरिया अर्ज़-ए-अहवाल की प्यासों में कहां ताब मगर आंखें ऐ अब्र-ए-करम तकती हैं रस्ता तेरा मौत नज़दीक गुनाहों की तहें मैल के खोल आ बरस जा कि नहा धोले ये प्यासा तेरा आब-ए-आमद वो कहे और मैं तयम्मुम बरख़ास्त मुश्त-ए-ख़ाक अपनी हो और नूर का आला तेरा जां तो जाते ही जाए गी क़यामत ये है कि यहां मरने पे ठहरा है नज़ारा तेरा तुझ से दर से सग और सग से है मुझ को निस्बत मेरी गर्दन में भी है डोर का डोरा तेरा इस निशानी के जो सग हैं नहीं मारे जाते हश्र तक मेरे गले में रहे पट्टा तेरा मेरी क़िस्मत की क़सम खाएं सगान-ए-बग़दाद हिंद में भी हूं तो देता रहूं पहरा तेरा तेरी इज़्ज़त के निसार ऐ मेरे ग़ैरत वाले आह सद आह कि यूं ख़्वार हो परवा तेरा बद सही, चोर सही, मुजरिम ओ नाकारा सही ऐ वो कैसा ही सही है तू करीमा तेरा मुझ को रुसवा भी अगर कोई कहे गा तो यूं ही के वही ना, वो रज़ा बंदा-ए-रुसवा तेरा हैं रज़ाइयों ना बल्क तू नहीं जय्यद तो ना हो सय्यद-ए-जय्यद हर दहर है मौला तेरा फ़ख़्र-ए-आक़ा में रज़ा और भी एक नज़्म-ए-रफ़ी चल लिखा लाएं सना ख़्वानो में चेहरा तेरा