या रब! फिर औज पर यह हमारा नसीब हो
सू-ए-मदीना फिर हमें जाना नसीब हो
मक्का भी हो नसीब मदीना नसीब हो
दश्त-ए-अरब नसीब हो सहरा नसीब हो
हज्ज का सफ़र फिर ए मेरे मौला नसीब हो
अरफ़ात का मिना का नज़ारा नसीब हो
अल्लाह! दीद-ए-गुम्बद-ए-ख़ज़रा नसीब हो
या रब! रसूल-ए-पाक का जलवा नसीब हो
चूमूं अरब की वादियां ए काश! जा के फिर
सहरा में उन के घूमना फिरना नसीब हो
काबे के जलवों से दिल-ए-मुज़्तर हो काश! शाद
लुत्फ़-ए-तवाफ़-ए-खाना-ए-काबा नसीब हो
मक्के में उन की विलादत पे या ख़ुदा
फिर चश्म-ए-अश्कबार जमाना नसीब हो
किस तरह शौक़ से वहां करते थे हम तवाफ़
फिर गिर्द-ए-काबा झूम के फिरना नसीब हो
हम जा के ख़ूब लूटें मदीने की धूल पर
आंखों में ख़ाक-ए-तैयबा लगाना नसीब हो
सद आफ़रीन! गुम्बद-ए-ख़ज़रा की ताबिशें
जलवों में उस के खुद को गुमाना नसीब हो
वां चलचलाती धूप का भी इक सुरूर है
जूते उतार कर वहां चलना नसीब हो
नमनाक आंख गुम्बद-ए-ख़ज़रा को चूम ले
झुक जाए फिर अदब से वह लम्हा नसीब हो
करदूं में काश! जालियों पर अपनी जां फ़िदा
रौज़ा का उन के जिस घड़ी जलवा नसीब हो
मेहराब ओ मिंबर और वह हरयाली जालियां
और मस्जिद-ए-हबीब का जलवा नसीब हो
जन्नत की प्यारी क्यारी की थीं ख़ूब रौनक़ें
फिर बैठना वहां पे ख़ुदाया नसीब हो
छुप छुप के देखूं मिंबर-ए-अक़दस की फिर बहार
शायद कभी तो शाह का जलवा नसीब हो
हिज्र-ए-रसूल में हमें या रब-ए-मुस्तफ़ा
ए काश! फूट फूट के रोना नसीब हो
अत्तार की हो हाज़िरी हर साल या ख़ुदा
आख़िर को तैयबा में उसे मरना नसीब हो