या रब्ब-ए-मुहम्मद मरि तक़दीर जगादे, सहरा-ए-मदीना मुझे आँखों से दिखादे
पीछा मरा दुनिया की मोहब्बत से छुड़ा दे, या रब्ब मुझे मदीने का दीवाना बनादे
रोता हुआ जिस वक़्त मैं दरबार में पहुँचूँ, उस वक़्त मुझे जलवा-ए-महबूब दिखादे
दिल-ए-इश्क़-ए-मुहम्मद में तड़पता रहे हर दम, सीने को मदीना मरे अल्लाह बनादे
बहती रहे अक्सर शब-ए-अबरार के ग़म में, रोती हुई वो आँख मुझे मेरे ख़ुदा दे
ईमान पे दे मौत मदीने की गली में, मदफ़न मरा महबूब के क़दमों में बनादे
अल्लाह करम इतना गुनहगार पे फ़र्मा, जन्नत में पड़ोसी मरे आक़ा का बनादे
देता हूँ तुझे वास्ता मैं प्यारे नबी का, उम्मत को ख़ुदाया रह-ए-सुन्नत पे चला दे
अल्लाह मिले हज्ज की इसी साल सआदत, बदकार को फिर रौज़ा-ए-महबूब दिखादे
अत्तार से महबूब की सुन्नत की ले ख़िदमत
डंका ये तेरे दीन का दुनिया में बजादे