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Zair-e-Taiba! Rozay pe ja kar, tu salam un se ro ro ke kehna

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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ज़ाइर-ए-तैबा! रौज़े पे जा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना मेरे ग़म का फ़साना सुना कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तेरी क़िस्मत पे रश्क आ रहा है, तू मदीने को अब जा रहा है आह! जाता है मुझ को रुला कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना जब पहुँच जाए तेरा सफ़ीना, जब नज़र आए मीठा मदीना बा-अदब अपने सर को झुका कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना जब कि आए नज़र प्यारा आक़ा, चूम लेना नज़र से तू कअबा हो सके गर तो हर जा पे जा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तू अरब की हसीं वादियों को, रेगज़ारों को आबादियों को मेरी जानिब से पलकें बिछा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना जब कि पेश-ए-नज़र जालियां हों, तेरी आँखों से आँसू रवाँ हों मेरे ग़म की कहानी सुना कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना आमिना के दुलारे को पहले, बाद शैखैन को भी तू कह ले फिर बक़ी-ए-मुबारक पे जा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना मांगना मत तू दुनिया की दौलत, मांगना उन से बस उन की उल्फ़त ख़ूब दीवाने दिल को लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना मेरे आक़ा के मेहराब-ओ-मिंबर, उन की मस्जिद के दीवार और दर क़ल्ब की आँख उन पर जमा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना प्यारी प्यारी वो जन्नत की क्यारी, चूम लेना निगाहों से सारी बहर-ए-रहमत में ग़ोता लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना सब्ज़ गुंबद के दिलकश नज़ारे, रूह परवर वहां के मीनारे उन के जलवों में ख़ुद को गुमा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना वो शहीदों के सरदार हमज़ा, और जितने वहां हैं सहाबा तू सभी के मज़ारों पे जा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तू नमाज़ों का पाबंद बन जा, और सरकार की सुन्नतों का इंक़लाब अपने अंदर बपा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना सू-ए-महबूब की बकरियों को, मुर्ग़ियों, लकड़ियों, लकड़ियों को बल्कि तिनके वहां के उठा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना बुलियां जब मदीने की देखे, ख़ूब अदब से उन्हें प्यार कर के हाथ नरमी से उन पे फेरा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना उन मदीने में बादल घेरें जब, उन से बेताब क़तरे गिरें जब बारिश-ए-नूर में तू नहा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना अश्क-ए-उलफ़त की महकी लड़ी से, रहमतों की बरसती झड़ी से अपना सीना मदीना बना कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना ज़ाइर-ए-तैयबा! मेरा फ़साना, ख़ूब रो रो के उन को सुनाना सोज़-ए-उलफ़त से दिल को जला कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना संगरेज़ों को और पत्थरों को, ऊंट घोड़ों, महरों, खच्चरों को और परिंदों पे नज़रें जमा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना रो रहा है हर एक ग़म का मारा, अर्ज़ करता है तुझ से बेचारा मेरी भी हाज़िरी की दुआ कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना बाग़-ए-तैयबा की महकी फ़ज़ा को, ठंडी ठंडी वहां की हवा को हाथ लहरा के सर को झुका कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना चूम लेना मदीने की गलियां, पत्तियां और फूलों की कलियां सब को आंखों से अपनी लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना जब मदीने के सहरा से गुज़रे, भूलना मत, ज़रा याद कर के ख़ाक-ए-तैयबा ज़रा सी उठा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तू मदीने के कोहसार को भी, ख़स को ख़ाशाक को ख़ार को भी ज़र्रे ज़र्रे पे आंखें बिछा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना उन का दीदार हो गर मुयस्सर, होश भी तेरा क़ायम रहे गर जोड़ कर हाथ, सर को झुका कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना वो मदीने के मदनी नज़ारे, दिलकश-ओ-दिलकुशा प्यारे प्यारे इन नज़ारों पे क़ुर्बान जा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना उन का देखे जो नक़्श-ए-कफ़-ए-पा, ख़ूब आंसू वहां पर बहाना और पलकों से झाड़ू लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना बे-बसों, ग़म के मारों को भाई! बे-कसों, दिल फ़िगारों को भाई! ख़ुद भी रो कर, उन्हें भी रुला कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना अश्कबार आंख वालों को भाई, उन की आहों को नालों को भाई! तू मज़ीद उन के ग़म में रुला कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तू मदीने की हरियालियों को, और फलों से लदी डालियों को मीठी मीठी खजूरें मंगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना वो मदीने के प्यारे कबूतर, जब नज़र आएं तुझ को बरादर उन को थोड़े से दाने खिला कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तू दरख़्तों को और झाड़ियों को, उन की गलियों की सब गाड़ियों को हाथ अपना अदब से लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना बोतलों बल्कि तू ढक्कनों को, दाल, गंदम के दानों, चनों को चूम कर आंख से भी लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना बैंगनों, भिंडियों, तोरियों को, गोभीयों, गाजरों, मूलीयों को आंख से लोक यूं को लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना कहना सीबों को और आड़ूओं को, और केलों को ज़र्द आलूओं को और तरबूज़ सर पे उठा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तू कनादील को क़ुमक़ुमों को, तू सोच, तार को, कूलरों को ठंडा पानी किसी को पिला कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना चींटियों, खूंटियों, टोनियों को, हर तरह की जड़ी बूटियों को बार बार इन पे नज़रें जमा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना चावलों, रोटियों, बोटियों को, मुर्ग, अंडों और मछलियों को सब्जियों को वहां की पका कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना थालियों को प्यालों को भाई! मिर्च को और मसालों को भाई! चाय की केतली को उठा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना ठंडे पंखों को और हीटरों को, बल्कि तारों और मीटरों को बत्तियों को वहां की जला कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना जिस क़दर भी हैं पानी के नलके, फल तो फल बल्कि बीज और छिलके हाथ इन की तरफ़ भी बढ़ा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तू मकानों को भी खिड़कियों को, और दीवार-ओ-दर, सीढ़ियों को हां अक़ीदत से दिल में बिठा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना रस्सियों, क़ैंचियों और छुरियों, चादरों, सूई धागों को डोरियों सब को सीने से अपने लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना काश होता मैं सग-ए-सैय्यद का, बन के दरबान पहरा भी देता रब ने भेजा है इंसां बना कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना मस्जिद-ए-पाक के मुसहफ़ों को, ख़ूबसूरत वहां की सफ़ों को ख़ाक आंखों में अपनी लगा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना जब मदीने से तू होगा रुख़सत, ग़म से होगी अजब तेरी हालत अपनी पलकों पे मोती सजा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना अर्ज़ करना कि है अर्ज़ इतनी, हाज़िरी हो मदीने हमारी सब की जानिब से यह इल्तिजा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना अर्ज़ करना यह बेचारे बेबस, कहते थे सब यह रो रो के बेकस हम को क़दमों में मदफ़न अता कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना तू गुलामों पे कहना करम कर, या नबी दूर रंज-ओ-अलम कर उन को अपनी मुहब्बत अता कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना कहना अत्तार ऐ शाह-ए-आली! है फ़क़त तुझ से तेरा सवाली तू सवाल इस का पूरा शबा कर, तू सलाम उन से रो रो के कहना