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Zamana hajj ka hai jalwa diya hai shahid gul ko

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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ज़माना हज्ज का है जलवा दिया है शाहिद गुल को इलाही ताक़त-ए-परवाज़ दे परहाए बुलबुल को बहारें आईं जोबन पर घिरा है अब्र-ए-रहमत का लब-ए-मुश्ताक़ भीगें दे इजाज़त साक़िया मिल को मिले लब से वो मुश्किलें मुहर वाली दम में दम आए टपक सुन कर क़ुम-ए-ईसा कहूं मस्ती में क़ुल-क़ुल को मचल जाऊं सवाल-ए-मुदआ पर थाम कर दामन बहकने का बहाना पाऊं क़सदन बे-तअम्मुल को दुआ कर बख्त-ए-खुफ़्ता जाग हंगाम-ए-इजाबत है हटाया सुबह-ए-रुख़ से शह ने शब-हाए गुल को ज़ुबान-ए-फ़लसफ़ी से अम्न-ए-ख़र्क़-ओ-इल्तियाम-ए-असरा पनाह-ए-दौर-ए-रहमत हाए यक साअत तसल्सुल को दो शम्बा मुस्तफ़ा का जुम्मा आदम से बेहतर है सिखाना क्या लिहाज़-ए-हैसियत ख़ू-ए-तअम्मुल को वुफ़ूर-ए-शान-ए-रहमत के सबब जुरअत है ऐ प्यारे न रख बहर-ए-ख़ुदा शर्मिंदा-ए-अर्ज़-ए-बे-तअम्मुल को परेशानी में नाम-ए-उन का दिल-ए-सद चाक से निकला इजाबत शाना करने आई गेसू-ए-तवस्सल को रज़ा सब्ज़ा-ए-ग़रदूं हैं कोतल जिस के मौकब के कोई क्या लिख सके उस की सवारी के तजम्मुल को