ज़र्रे झड़ कर तेरी पेज़ारोन के
ताज बनते हैं सैयारों के
हम से चोरों पे जो फरमाएं करम
खिलअत-ए-ज़र बनें पुश्तारों के
मेरे आक़ा का वो दर है जिस पे
माथे घिस जाते हैं सरदारों के
मेरे ईसा तेरे सदक़े जाऊं
तूर बे-तूर हैं बीमारों के
मुजरिमों! चशम-ए-तबस्सुम रखो
फूल बन जाते हैं अंगारों के
तेरे अबरू के तसदुक प्यारे
बंद करते हैं गिरफ्तारों के
जान-ओ-दिल तेरे कदम पर वारे
क्या नसीबे हैं तेरे यारों के
सिद्क-ओ-अद्ल-ओ-करम-ओ-हिम्मत में
चार सू ठहरे हैं इन चारों के
बहर-ए-तस्लीम-ए-अली मैदान में
सर झुके रहते हैं तलवारों के
कैसे आक़ा का बंदा हूँ रज़ा
बोल बाले मेरी सरकारों के