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Zarrey jhad kar teri peizaron ke

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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ज़र्रे झड़ कर तेरी पेज़ारोन के ताज बनते हैं सैयारों के हम से चोरों पे जो फरमाएं करम खिलअत-ए-ज़र बनें पुश्तारों के मेरे आक़ा का वो दर है जिस पे माथे घिस जाते हैं सरदारों के मेरे ईसा तेरे सदक़े जाऊं तूर बे-तूर हैं बीमारों के मुजरिमों! चशम-ए-तबस्सुम रखो फूल बन जाते हैं अंगारों के तेरे अबरू के तसदुक प्यारे बंद करते हैं गिरफ्तारों के जान-ओ-दिल तेरे कदम पर वारे क्या नसीबे हैं तेरे यारों के सिद्क-ओ-अद्ल-ओ-करम-ओ-हिम्मत में चार सू ठहरे हैं इन चारों के बहर-ए-तस्लीम-ए-अली मैदान में सर झुके रहते हैं तलवारों के कैसे आक़ा का बंदा हूँ रज़ा बोल बाले मेरी सरकारों के