ज़ियारत में करूँ और वो शफ़ाअत मेरी फ़रमाएं
मुझे हंगामा-ए-ईदैन या रब दिन हो महशर का
नसीब-ए-दोस्ताँ उन की गली में गर सुकनत हो
मुझे हो मग़फ़िरत का सिलसिला हर तार बिस्तर का
वो गिरिया आस्तान-ए-हनाना का आँखों में फिरता है
हुज़ूरी ने बढ़ाया था जो पाया औज-ए-मिंबर का
हमेशा रहरवान-ए-तैबा के ज़ेर-ए-क़दम आए
इलाही कुछ तो हो एज़ाज़ मेरे कासा-ए-सर का
सहारा कुछ ना कुछ रखता है हर फ़र्द-ए-बशर अपना
किसी को नेक कामों का हसन को अपने यावर का
महशर में गुनहगार का पल्ला हुआ भारी
पल्ला पे जो वो क़ुर्ब-ए-तराज़ू नज़र आया
या देखने वाला था तेरा या तेरा नजवा
जो हम को ख़ुदा बीन ओ ख़ुदा जो नज़र आया
शल हाथ सलातीन के उठे बहर-ए-गदाई
दरवाज़ा तेरा कुव्वत-ए-बाज़ू नज़र आया
यूसुफ़ से हसीन और तमन्ना-ए-नज़ारा
आलम में न तुम सा कोई ख़ुश-रू नज़र आया
फ़रियाद-ए-ग़रीबां से है महशर में वो बे-चैन
कौसर पे था या क़ुर्ब-ए-तराज़ू नज़र आया
तकलीफ़ उठा कर भी दुआ मांगी अदू की
ख़ुश-ख़ुल्क़ न ऐसा कोई ख़ुश-खू नज़र आया
ज़ाहिर हैं हसन अहमद-ए-मुख़्तार के मा'ने
कौदैन पे सरकार का क़ाबू नज़र आया
हर बात बद-आमालियों से मैं ने बिगाड़ी
और तुम ने मेरी बिगड़ी को हर बार बनाया
उस जलवा-ए-रंगीं का तसदुक था कि जिस ने
फ़िरदौस के हर तख़्ता को गुलज़ार बनाया
उन के दुर-ए-दंदान का वो सदका था कि जिस ने
हर क़तरा-ए-नैसां दुर-ए-शाहवार बनाया
उस रूह-ए-मुजस्सम के तबर्रुक ने मसीहा
जां बख़्श तुम्हें यूँ दम-ए-गुफ़्तार बनाया
उस चेहरा-ए-पुर-नूर की वो भीख थी जिस ने
मेहर-ओ-मह-ओ-अंजुम को पुर-अनवार बनाया
उन हाथों का जलवा था ये ऐ हज़रत-ए-मूसा
जिस ने यद-ए-बैज़ा को ज़िया-बार बनाया
उन के लब-ए-रंगीं की निछावर थी वो जिस ने
पत्थर में हुस्न-ए-लअल पुर-अनवार बनाया