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ज़ुल्मत-ए-दुनिया मुझे तन्हा समझ कर न घेर

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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ज़ुल्मत-ए-दुनिया मुझे तन्हा समझ कर न घेर माह-ए-तैबा की तजल्ली में नहीं कुछ भी देर या नबी तेरी दुहाई आफ़तों में घर गया रुख़ बदल दे मुश्किलों का और बलाएं मुझ से फेर गुम्बद-ए-ख़ज़रा को देखे एक अर्सा हो गया कब खुलेगी मेरी किस्मत अब लगेगी कितनी देर! नफ़्स-ओ-शैतां पर मुझे ग़ल्बा अता कर या ख़ुदा उस अली का वास्ता हूँ जो है तेरा शेर आह! मीज़ां पर खड़ा हूँ शाफ़े-ए-महशर करम! नेकियां पल्ले नहीं बस गुनाहों का है ढेर नार-ए-दोज़ख में न ले जाए कहीं माल-ए-हराम कर लो तौबा छोड़ दो ऐ भाईयो! सब हेर फेर सब को मरना ही पड़ेगा याद रखो भाईयो! देर में जाएगा कोई, कोई चलेगा सवेर या ख़ुदा आलम में ऊंचा परचम-ए-इस्लाम हो दुश्मनान-ए-दीं मुसलमानों से हों मगलूब-ओ-ज़ेर इश्क़-ए-अहमद ही से अत्तार आदमी है आदमी वरना ये मिट्टी का पुतला है फ़क़त मिट्टी का ढेर