अब बुला लीजिये ना मदीना, आ रहा है यह हज्ज का महीना
टूट जाए ना दिल का नगीना, अल-मदद ताजदार-ए-मदीना
आंसुओं की लड़ी बन रही हो, और आहों से फटता हो सीना
विर्द-ए-लब हो "मदीना मदीना" जब चलें सू-ए-तैयबा सफीना
मुझ को आक़ा! मदीने बुला लो! हसरतें मेरे दिल की निकालो
गौस-ए-आज़म का सदक़ा निभा लो, अब तो कह दो "चल मदीना"
जब मदीने में हो अपनी आमद, जब मैं देखूं तेरा सब्ज़ गुम्बद
हिचकियां बांध कर रोऊं बे-हद, काश! आ जाए ऐसा क़रीना
काश! इस शान से हाज़िरी हो, मुझ पे दीवानगी छा गई हो
हर रुकावट वहां हट गई हो, बस नज़र में हों शाह-ए-मदीना
मुश्किलें, आफ़तें दूर होंगी, ज़ुल्मतें ग़म की काफ़ूर होंगी
मेरी आंखें भी पुर-नूर होंगी, इक झलक! मेरे माह-ए-मदीना
दिल से उलफ़त जहां की निकालो, इस तबाही से मौला बचा लो
मुझ को दीवाना अपना बना लो, मेरा सीना बना दो मदीना
मुझ पे आक़ा! निगाह-ए-करम हो, दूर दुनिया का रंज ओ अलम हो
बस अता अपना ग़म चश्म-ए-नम हो, दीजिये मुझ को पुर-सोज़ सीना
मैं मुबल्लिग़ बनूं सुन्नतों का, ख़ूब चर्चा करूं सुन्नतों का
या ख़ुदा! दर्स दूं सुन्नतों का, बहर-ए-ख़ाक-ए-मदीना
आंसुओं की झड़ी लग गई है, याद-ए-आक़ा की तड़पा रही है
इस पे दीवानगी छा गई है, याद आया है उस को मदीना
बाद-ए-मुर्दन यह एहसान करना, मुंह पे ख़ाक-ए-मदीना छिड़कना
और मेरे कफ़न पर लगाना, गर मयस्सर हो उन का पसीना
है तमन्ना-ए-अत्तार या रब! उन के जलवों में यूं मौत आए
झूम कर जब गिरे मेरा लाशा, थाम लें बढ़ के शाह-ए-मदीना