(गली वगैरह के अंदर आवाज़ें लगा कर या फ़ोन कर के नमाज़-ए-फ़ज्र के लिए जगाना दावत-ए-इस्लामी के मदनी माहौल में 'सदा-ए-मदीना' कहलाता है। गली में 'सदा-ए-मदीना' लगाने में मेगाफ़ोन इस्तेमाल न कीजिये, आवाज़ लगाने में ये भी एहतियात कीजिये कि छोटे बच्चों, मरीज़ों और जो इस्लामी बहनें नमाज़ पढ़ कर सोई हों या तिलावत वगैरह में मशगूल हों उन्हें परेशानी न हो। मरीज़ या बच्चे की तकलीफ़ के सबब कोई शख़्स 'सदा-ए-मदीना' की आवाज़ धीमी रखने का कहे तो फ़ौरन उस की बात मान लीजिये)
गली में सदा-ए-मदीना का तरीक़ा
बिस्मिल्लाह-हिर-रहमान-निर-रहीम पढ़ कर दुरूद-ओ-सलाम के ज़ैल में दिये हुए सीग़े पढ़ कर के बाद वाला मज़मून दोहराते रहिये:
अस्सलातु वस्सलामू अलैका या रसूलल्लाह व अला आलिक व असहाबिका या हबीबल्लाह
अस्सलातु वस्सलामू अलैका या नबियल्लाह व अला आलिक व असहाबिका या नूरल्लाह
मीठे मीठे इस्लामी भाइयो और इस्लामी बहनो! फ़ज्र की नमाज़ का वक़्त हो गया है, सोने से नमाज़ बेहतर है, जल्दी जल्दी उठिये और नमाज़ की तैयारी कीजिये- अल्लाह अज़्ज़-व-जल्ल आप को बार बार हज्ज नसीब करे और बार बार मीठा मदीना दिखाए, (मौक़े की मुनासबत से नीचे दी हुई नज़्म में से मुंतख़ब अशआर भी पढ़िये)