Gham-e-furqat dil-e-ushaq ko be-had rulata hai
Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri
ग़म-ए-फ़ुर्क़त दिल-ए-उश्शाक़ को बे-हद रुलाता है
तड़प उठते हैं जब उन को मदीना याद आता है
मुझे उस के मुक़द्दर पर बड़ा ही रश्क आता है
मदीने की तरफ कोई मुसाफ़िर जब भी जाता है
मुझे उस वक़्त दीवाने पे बे-हद प्यार आता है
ग़म-ए-हिज्र-ए-मदीना में वो आँसू बहाता है
ये बीमार-ए-मदीना है तबीबो! तुम न समझोगे
तड़पता है उसे जिस दम मदीना याद आता है
दिखा दो सब्ज़ गुंबद की बहारें या रसूल अल्लाह
न जाने कब मदीने का बुलावा मुझ को आता है
मदद सरकार फ़रमाते हैं दीवाना अगर कोई
तड़प कर या रसूल अल्लाह का नारा लगाता है
अता कर दो, अता कर दो बक़ी-ए-पाक में मदफ़न
मुझे गोर-ए-ग़रीबां वतन से ख़ौफ़ आता है
नहीं है चांद सूरज की मदीने को कोई हाजत
वहाँ दिन रात उन का सब्ज़ गुंबद जगमगाता है
हुकूमत की तलब दिल में, न ख़्वाहिश ताज-ए-शाही की
नज़र में आशिक़ों के बस मदीना ही समाता है
सख़ावत भी तेरे घर की, इनायत भी तेरे घर की
तेरे दर का सवाली झोलियां भर भर के लाता है
इबादत हो तो ऐसी हो, तिलावत हो तो ऐसी हो
सर-ए-शब्बीर नेज़े पे भी क़ुरआं सुनाता है
बरसती है ख़ुदा की उस पे रहमत झूम कर अत्तार
ग़म-ए-महबूब में जो कोई दो आँसू बहाता है
मुस्तफ़ा का करम हो गया है, दिल ख़ुशी से मेरा झूमता है
इज़्न-ए-फिर हाज़िरी का मिला है, क़ाफ़िला सू-ए-तैबा चला है
कूच का वक़्त अब आ चुका है, क़ाफ़िला फिर मदीने चला है
मुँह दिखाऊँगा किस तरह उन को, पास हुस्न-ए-अमल मेरे क्या है
मैं मदीने के क़ाबिल नहीं हूँ, बस नबी ने करम कर दिया है
बोज-ए-इसयां का सर पर धरा है, बस गुनाहों का ही सिलसिला है
लूटने को बहार-ए-मदीना, चूमने को ग़ुबार-ए-मदीना
इज़्न से ताजदार-ए-मदीना, तेरे तेरा गदा चल पड़ा है
मुलतजी तुझ से है इक कमीना, माँगता है ये कुफ़्ल-ए-मदीना
दे के दीद उसे इस्तिक़ामत, पस्त हिम्मत ये कम हौसला है
सू-ए-तैबा सफ़र करने वालों, लब पे कुफ़्ल-ए-मदीना लगालो
आँख शर्म-ओ-हया से झुकालो, बस इसी में तुम्हारा भला है
हाज़िरी को मिले चंद लम्हे, बच गए कूच के आह! डंके
है अजब वस्ल-ओ-फ़ुरक़त का संगम, हिज्र के ग़म में दिल रो रहा है
सैय्यदी मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत! कीजे मुझ पे चश्म-ए-इनायत
दूर हो जाए दिल की क़सावत, तुझ को सिद्दीक़ का वास्ता है
या नबी! मुजरिम आए हुए हैं, बार-ए-इसयां उठाए हुए हैं
आस तुझ पे लगाए हुए हैं, तेरी रहमत ही का आसरा है
मैं ने जब भी इबादत का सोचा, नफ़्स ने फ़ौरन उस दम दबोचा
नेकियों का नहीं सिलसिला कुछ, बस गुनाहों में ही दिल फँसा है
है हवस माल की, क़ल्ब भटका, हर नफ़्स है ही बस हुब-ए-दुनिया
अपनी उल्फ़त का साग़र पिला दो, या हबीब-ए-ख़ुदा इल्तिजा है
हुब-ए-दुनिया-ए-मुर्दार दिल में, कर चुकी घर है सरकार दिल में
तुम जो आ जाओ दिलदार दिल में, बस टली दिल से फिर ये बला है
या नबी! आप के आशिक़ों को, आप की दीद के तालिबों को
अपना जलवा दिखा दीजिये ना, इन बेचारों को अरमाँ बड़ा है
उम्र अत्तार बावन बरस की, है हवस तुझ को दुनिया की फिर भी
अब तो जी जी के कितना जिएगा, वक़्त-ए-रिहलत क़रीब आ चुका है
क़ाफ़िला "चल मदीना" का आक़ा, चल पड़ा जानिब-ए-तैबा मौला
तेरे उश्शाक़ के पीछे पीछे, तेरा अत्तार भी आ रहा है
मदीना